जर्मनी में 34 फीसदी विदेशी अपने जीवनसाथी से इसलिए अलग रहने को मजबूर हैं, क्योंकि उन्हें जर्मन भाषा नहीं आती है। ये जानकारी जर्मनी के वीसा के लिए जरूरी डॉयच-1 टेस्ट की रिपोर्ट में कही गई है। ये एक ऐसा टेस्ट है जिसमें जर्मन की बेसिक जानकारी पूछी जाती है। अगर किसी को वीजा चाहिए होता है तो उसे अप्रवासी विभाग में इसका सर्टिफिकेट जमा करना होता है, तभी वीजा की प्रक्रिया आगे बढ़ पाती है।
हालांकि ये नियम यूरोपीय संघ के देशों और अमेरिकी, इजरायली लोगों पर लागू नहीं है। सरकार द्वारा 2018 में जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते साल 48,130 लोगों ने ये टेस्ट दिया था। जिनमें से 16,200 लोग फेल हो गए। इनमें से अधिकतर लोग तुर्की, रूस, मैसेडोनिया, कोसोवो, थाईलैंड, वियतनाम और इराक से थे। सबसे ज्यादा इराकी (50 फीसदी) लोग फेल हुए हैं।
इस मामले पर अप्रवासी और शरणार्थी विभाग का कहना है कि ये टेस्ट वही लोग पास कर पाते हैं, जो जर्मन भाषा के आसान वाक्य समझ सकते हों। साथ ही जर्मन भाषा में खुद के बारे में बता सकें। इसका मतलब ये है कि उन्हें इतनी जर्मन आनी चाहिए कि वह बाजार में खरीददारी कर सकें। उनसे उम्मीद की जाती है कि वो इस भाषा में फॉर्म भर पाएं और सामने वाले को सही जानकारी दे सकें।
इसपर जर्मन सरकार की अधिकारी अनेटे विडमन का कहना है कि विदेशी लोगों को पहले से ही जर्मन का सामान्य ज्ञान होना चाहिए। ताकि वह यहां आकर लोगों से घुलमिल सकें। वहीं सरकार के इस नियम का विपक्ष की लेफ्ट पार्टियां विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि यह एक अव्यवहारिक शर्त है।
इस पार्टी के सांसद ग्योके अकबुलुत का कहना है कि इस नियम की वजह से ना जाने कितने लोग अपने परिवार से दूर रहने को मजबूर हैं। वहीं जर्मनी आकर जर्मन सीखना अधिक आसान है। कोई भी भाषा व्यवहार के इस्तेमाल के कारण आसानी से सीखी जा सकती है।