संभल शहर से करीब पांच किलोमीटर दूरी पर बसे गांव चिमियावली की बहादुर बेटी मंजू को आत्मनिर्भर बनने की ललक ने इतना आगे बढ़ा दिया है कि वह अब मुड़कर पीछे देखना ही नहीं चाहती। वह अपने भविष्य को संवारना चाहती है। उसके हाथ नहीं हैं और वह पैरों से अपने सपने बुन रही है। पैरों से कंप्यूटर चला लेती है। कपड़े प्रेस करती है। कपड़े भी सिलती है। उसका कहना है कि उसने कड़े संघर्ष के बाद खुद को अब तैयार कर लिया है। वह बीए कर रही है और पैरों से ही लिखती है।