इस शहर के असली जनप्रतिनिधि अब यहां के ब्यूरोक्रेट हो गए हैं। कांग्रेस तो परिदृश्य से एक सप्ताह तक गायब ही रही। कांग्रेस को जनता की कोई चिंता नहीं थी। जब कांग्रेस को लगा कि यह भाजपा नेताओं और सरकार को घेरने का अच्छा मौका है, तब कांग्रेस सक्रिय हुई। भागीरथपुरा श्रमिक एरिया है, वहां कांग्रेस का पुराना नेटवर्क है, फिर भी शुरुआती दौर में नेता कहां थे? उन्हें इस बात की भनक ही नहीं लग पाई? पिछले 10 साल से हम देख रहे हैं कि असली नेता ब्यूरोक्रेट हैं। चुने हुए जनप्रतिनिधियों को लगता है कि यदि कलेक्टर या कमिश्नर नाराज हो जाएगा, तो हम राजनीति नहीं कर पाएंगे। इंदौर के लिए यह घातक संकेत है। जिस शहर को सुरेश सेठ और महेश जोशी जैसे नेता मिले, वहां नेता इतने पंगू क्यों हो गए? कैलाश विजयवर्गीय भी अपने शुरुआती दौर में इसी भूमिका में थे। फिर बाद में क्या हुआ?