आगरा में यमुना नदी ने इस बार ऐसा कहर बरपाया है, जो शहर ने पिछले 47 वर्षों में नहीं देखा था। नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंचने के बाद शहर की 100 से अधिक कॉलोनियां डूब गई हैं। सड़कें, घर और खेत-खलिहान पानी में समा गए हैं। हजारों लोग बेघर हो गए हैं और कई मोहल्लों में पिछले 24 घंटे से बिजली गुल है। शहर की एक लाख से ज्यादा आबादी इस बाढ़ से प्रभावित हो चुकी है।
सोमवार शाम को वॉटर वर्क्स पर यमुना का जलस्तर 501.1 फीट दर्ज किया गया, जो खतरे के निशान (499 फीट) से 2.1 फीट ऊपर था। आखिरी बार 1978 में यमुना का जलस्तर 508 फीट तक पहुंचा था। इस बार के हालात उस भयावह दौर की याद दिला रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि गोकुल बैराज से सोमवार को 1.60 लाख क्यूसेक पानी आगरा की तरफ छोड़ा गया है। ऐसे में आने वाले 24 घंटे में जलस्तर और बढ़ने की आशंका है।
दयालबाग के मां गौरी टाउन, तनिष्क, राजश्री अपार्टमेंट, लोहिया नगर, अनुराग नगर, मोती महल, गांधी स्मारक और शंभूनाथ कॉलोनी जैसे इलाकों में पानी भर गया है। सड़क संपर्क कट गया है और लोग अपने घरों में कैद होकर रह गए हैं। ग्रामीण इलाकों में भी हालात गंभीर हैं। जिले के 60 से ज्यादा गांवों में बाढ़ का पानी घुस चुका है। खेत-खलिहान जलमग्न हो गए हैं और 10 हजार बीघा से अधिक फसल नष्ट होने का अनुमान है।
यमुना का उफान सिर्फ आबादी के लिए ही नहीं, बल्कि आगरा की ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी बड़ा खतरा बन गया है। ताज व्यू प्वाइंट पूरी तरह डूब गया है। महताब बाग, ग्यारह सीढ़ी पार्क, एत्माउद्दौला और ताजमहल तक पानी पहुंच गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलस्तर इसी तरह बढ़ता रहा, तो इन संरक्षित स्मारकों की नींव को नुकसान हो सकता है।
बाढ़ग्रस्त बरौली अहीर के मेहरा नाहरगंज गांव में यमुना में नहाने गए तीन युवक नदी में डूब गए। आसपास के लोगों ने दो युवकों को बचा लिया, लेकिन 20 वर्षीय रवींद्र को नहीं बचाया जा सका। दो घंटे की मशक्कत के बाद उसे दलदल में फंसा पाया गया और अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। यह हादसा बाढ़ग्रस्त इलाकों की खतरनाक स्थिति को बयां करता है।
प्रशासन का दावा है कि अब तक केवल 752 लोग प्रभावित हुए हैं। एडीएम वित्त शुभांगी शुक्ला ने बताया कि कैलाश मंदिर के पास 44 परिवारों को राहत शिविर में विस्थापित किया गया है, जहां 128 बच्चे, 38 महिलाएं, 42 पुरुष और 12 बुजुर्गों को शरण दी गई है। प्रशासनिक टीम राहत और भोजन की व्यवस्था का दावा कर रही है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। हजारों लोग पानी से घिरे हैं, सैकड़ों घरों में कीचड़ और गंदगी भर चुकी है।
प्रभावितों का कहना है कि प्रशासन की व्यवस्था नाकाफी है। कई लोग बीमार पड़ रहे हैं और संक्रामक रोग फैलने का खतरा बढ़ रहा है। घरों में रखा अनाज, कपड़े और जरूरी सामान बर्बाद हो चुका है। पुराने शहर में बाढ़ का पानी भरने से जाम की समस्या भी चरम पर है। रविवार देर रात से हाथी घाट और यमुना किनारा मार्ग पर पानी भर गया, जिसके कारण सोमवार सुबह लोगों को दस मिनट का रास्ता तय करने में दो घंटे से ज्यादा का वक्त लगा।
विशेषज्ञों और प्रशासन का मानना है कि अगले दो दिन हालात और बिगड़ सकते हैं। अगर बैराज से और पानी छोड़ा गया, तो यमुना का जलस्तर 1978 जैसा भयावह रूप ले सकता है। इससे शहर की बड़ी आबादी और ऐतिहासिक धरोहरें खतरे में पड़ जाएंगी।
आगरा में यमुना की बाढ़ ने प्रशासन की तैयारियों की पोल खोल दी है। आंकड़े चाहे जितने कम दिखाए जा रहे हों, हकीकत यह है कि लाखों लोग परेशानी झेल रहे हैं। स्मारकों पर खतरा मंडरा रहा है और आम जनता के लिए जीवन दुरुह हो गया है। यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही का भी परिणाम है।