अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर दुनिया को हैरान कर देने वाला बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि अमेरिका अब परमाणु परीक्षण दोबारा शुरू करेगा। ट्रंप ने दावा किया कि रूस और चीन लगातार परमाणु गतिविधियों में जुटे हैं, इसलिए अब अमेरिका भी पीछे नहीं रहेगा। इस बयान ने वैश्विक स्तर पर एक नई परमाणु हथियार दौड़ की आशंका को जन्म दे दिया है।
एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या अमेरिका पारंपरिक भूमिगत परमाणु परीक्षण भी करेगा, तो उन्होंने रहस्यमयी अंदाज में जवाब दिया “आपको बहुत जल्द पता चल जाएगा। लेकिन हम कुछ परीक्षण करने वाले हैं। दूसरे देश ऐसा करते हैं, तो हम भी करेंगे।”
ट्रंप का यह बयान सिर्फ एक संकेत नहीं, बल्कि संभवतः उस नीति परिवर्तन की ओर इशारा करता है जो बीते तीन दशकों से अमेरिका में रुका हुआ था।
ट्रंप ने कुछ दिन पहले ही पेंटागन को निर्देश दिया था कि वह तुरंत परमाणु हथियार परीक्षण की तैयारी शुरू करे। उनका कहना था, “संयुक्त राज्य अमेरिका के पास दुनिया में सबसे अधिक परमाणु हथियार हैं। यह मेरे पहले कार्यकाल में पूरी तरह अपग्रेड किए गए थे। मुझे यह करना पसंद नहीं, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था।”
यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस और चीन पर गुप्त परमाणु गतिविधियों के आरोप लगते रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि दोनों देश अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन कर अपने हथियारों का परीक्षण कर रहे हैं।
अमेरिका ने 1945 से 1992 के बीच कुल 1,054 परमाणु परीक्षण किए थे, जिनमें ज्यादातर नेवादा रेगिस्तान में हुए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ये परीक्षण अमेरिका की परमाणु क्षमता का प्रतीक बन गए थे। लेकिन 1963 में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ ने आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (Partial Test Ban Treaty) पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत वायुमंडलीय और समुद्री परीक्षणों पर रोक लगी।
1992 में अमेरिकी कांग्रेस ने भूमिगत परीक्षणों को भी रोक दिया। इसके बाद अमेरिका ने व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) पर हस्ताक्षर तो किए, लेकिन इसे आज तक स्वीकृति (Ratification) नहीं दी गई। यही वजह है कि अमेरिका औपचारिक रूप से परीक्षणों पर हमेशा के लिए प्रतिबंधित नहीं है।
परमाणु विशेषज्ञों ने ट्रंप के इस कदम को खतरनाक और गैरज़रूरी बताया है। उनका कहना है कि अमेरिका के पास अब अत्याधुनिक सुपरकंप्यूटर और सिमुलेशन तकनीक है, जिससे वह बिना वास्तविक धमाके के ही अपने हथियारों की जांच कर सकता है। ऐसे में वास्तविक परीक्षण की कोई तकनीकी आवश्यकता नहीं है।
नेवादा के सांसदों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि यह दुनिया को फिर से शीत युद्ध (Cold War) जैसी स्थिति में धकेल सकता है। उनका कहना है कि ऐसे परीक्षणों से रेडिएशन और पर्यावरण प्रदूषण का खतरा भी बढ़ेगा।
वहीं ट्रंप के समर्थक इस फैसले को “साहसिक और आवश्यक कदम” बता रहे हैं। उनका कहना है कि अगर रूस और चीन गुप्त परीक्षण कर रहे हैं, तो अमेरिका को भी अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए ताकि उसकी विश्वसनीयता पर कोई संदेह न रहे।
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला चुनावी और रणनीतिक दोनों रूपों में ट्रंप के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। इससे वे “मजबूत अमेरिका” की छवि को फिर से स्थापित कर पाएंगे।
ट्रंप का बयान वैश्विक राजनीति में नई भू-राजनीतिक हलचल पैदा कर सकता है। जहां एक ओर यह अमेरिका की शक्ति का प्रदर्शन है, वहीं दूसरी ओर यह दुनिया को नई अस्थिरता और भय की ओर भी धकेल सकता है।
अगर अमेरिका ने सच में परमाणु परीक्षण दोबारा शुरू किए, तो यह न सिर्फ पुराने जख्म कुरेद देगा, बल्कि वैश्विक शांति और पर्यावरण संतुलन पर भी गंभीर असर डाल सकता है।
अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि ट्रंप के शब्द सिर्फ राजनीतिक संदेश थे या आने वाले दिनों में सचमुच फिर गूंजेगा नेवादा का परमाणु धमाका।