उत्तराखंड के कई ग्रामीण क्षेत्र बरसात आते ही सिहर उठतें हैं। पिछले कई दशकों से ग्रामीण सरकार से विस्थापन की मांग भसी कर रहे हैं लेकिन सरकार है कि सुध लेने को राजी नहीं।
बाढ़ से भूस्खलन व भू-धंसाव की चपेट में आए गांवों के ग्रामीणों को अब सुरक्षा की चिंता सता रही है। ऐसे में ग्रामीण डीएम से लेकर सीएम तक ज्ञापन भेजकर गांवों के विस्थापन के साथ ही बाढ़ से हुई क्षति का उचित मुआवजा देने की गुहार लगा रहे हैं।
बाड़ागड्डी बाढ़ पीड़ित संघर्ष समिति अध्यक्ष किशन सिंह पंवार व सचिव विजेंद्र नौटियाल ने डीएम को ज्ञापन भेजकर अगवत कराया कि 16 व 17 जून की बाढ़ से जोशियाड़ा तथा लदाड़ी क्षेत्र में कई दुकान, होटल व घर बह गए थे। उन्होंने क्षति का उचित मुआवजा देने के ही प्रभावितों को जमीन उपलब्ध कराने की मांग की है।
मोरी नैटवाड़ के कांग्रेस कार्यकर्ता जगदीश रांगड़ ने भी डीएम को पत्र भेज आपदा प्रभावित गैच्वाणगांव के प्रभावित परिवारों को शिफ्ट करने की मांग की है। बताया कि भू-धंसाव से गांव को खतरा बना हुआ है। उन्होंने मोरी प्रखंड में बंद पड़े सड़क व सपंर्क मार्गों को खोलने की भी मांग की।
डुंडा प्रखंड के देवीधार, पंचाणागांव, फोल्ड, पटूडी आदि गांवों के ग्रामीणों ने डीएम के माध्यम से सीएम को ज्ञापन भेज बाढ़ से हुई क्षति का उचित मुआवजा देने की मांग की है। कहा कि बाढ़ से घरों के साथ ही सिंचित, असिंचित कृषि भूमि को भी भारी नुकसान पहुंचा है।
स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे ग्रामीण
ज्ञापन में मंगल सिंह राणा, विजेंद्र परमार, मदन चौहान, नत्थी सिंह, धर्मेंद्र राणा के हस्ताक्षर हैं। ग्राम प्रधान क्यार्क रेशमा राणा ने भी सरकार से गांव के विस्थापन की मांग की। उन्होंने बताया कि पापड़ गाड़ से गांव पर भूस्खलन का खतरा मंडरा है। अब तक गांव में कई भवन ढह चुके हैं। ऐसे में ग्रामीण स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।