पहले परागण सीजन में बारिश से सेब की अधिकांश फसल बर्बाद हुई और अब बची हुई फसल को मंडियों तक पहुंचाने में बारिश से टूटी सड़कें रोड़ा बन गई हैं। ऐसे में दस हजार मीट्रिक टन से ज्यादा सेब उत्पादन करने वाले मोरी क्षेत्र के किसानों की नींद उड़ गई है। इस बार कानपुर मंडी में मोरी से गए अर्ली स्पर वैरायटी के सेब 170 रुपये किलो की दर से बिके।
मोरी क्षेत्र में जखोल-लिवाड़ी, खूनीगाड-सरांश, नैटवाड़-सेवा, दोणी भीतरी और सांकरी-तालुका आदि सड़कें बारिश से भूस्खलन से बंद पड़ी हैं। ऐसे में करीब 24 से ज्यादा गांवों की सेब की फसल मुख्य सड़क तक भी नहीं पहुंच पा रही है। घोड़े-खच्चरों से सेब सड़क तक उतारना काफी महंगा पड़ता है और कई जगह तो पैदल चलने लायक रास्ते भी नहीं बचे हैं।
मोरी के राजेंद्र सिंह, जगमोहन सिंह, विपिन चौहान आदि का कहना है कि अच्छी कीमत मिलने के समय क्षेत्र के सेब मंडियों तक नहीं पहुंचे, तो सेब किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पहले यहां फ्लावरिंग सीजन में बेमौसमी बारिश से सेब की 70 फीसदी फसल चौपट हो गई और बाद में कुछ नुकसान सूखे से हुआ। अब जो सेब बचा है वह सड़कें समय पर ठीक नहीं होने से या तो बागीचों में ही बर्बाद होगा या फिर औने-पौने दामों पर बिकेगा।
इधर, गंगोरी-संगमचट्टी मोटर मार्ग चीवां से आगे भारी वाहनों की आवाजाही लायक नहीं है। क्षेत्र के सात गांवों की आजीविका मुख्य रूप से आलू उत्पादन पर ही टिकी है। यदि सड़क नहीं खुली, तो किसान बर्बाद हो जाएंगे। क्षेत्र के एक ही गांव से साठ से सत्तर ट्रक लोड आलू का उत्पादन होता है।
भंकोली के शूरवीर सिंह, ढासड़ा के धनीराम, सेकू के कमल सिंह, अगोड़ा के शिवराम सिंह आदि का कहना है कि यदि छानियों और गांव को जोड़ने वाली अस्थायी पुलिया और संगमचट्टी सड़क शीघ्र ठीक नहीं हुई, तो इसी माह तैयार होने वाली आलू की फसल को बाजार पहुंचाना मुश्किल होगा। जिले की खरादी-नगाणगांव, राजगढ़ी-सरनौल, भुक्की-कुज्जन आदि 24 आंतरिक सड़कें बंद होने से दर्जनों गांवों की आवाजाही ठप पड़ी है।