टिहरी बांध प्रभावित उत्तरकाशी जनपद के 241 गांव परियोजना शुरू होने के दस साल बाद भी कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) कार्यक्रम के लाभ से वंचित हैं। टीएचडीसी की सीएसआर पॉलिसी के तहत प्रभावित 22 गांवों को कार्यक्रम से आंशिक लाभ मिला, लेकिन शेष 241 गांवों को एक धेले का लाभ नहीं मिला।
कार्यक्रम के तहत बांध प्रभावित गांवों को कुर्सी, टेंट, बर्तन आदि खरीद के लिए दो-दो लाख रुपये देने के साथ ही रोजगारपरक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाने थे।
टीएचडीसी की टिहरी बांध परियोजना वर्ष 2006 में बनकर चालू हो गई। बांध की झील में चिन्यालीसौड़ ब्लाक के तटवर्ती गांवों में घर एवं खेत डूबने के साथ ही उत्तरकाशी को देश-दुनिया से जोड़ने वाली सड़क का बड़ा हिस्सा भी डूबा।
जिले के ढाई सौ से अधिक गांव प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से टिहरी बांध परियोजना से प्रभावित हुए। टीएचडीसी ने कुल लाभ के दो प्रतिशत हिस्से को बांध प्रभावित गांवों के विकास पर खर्च करने की नीति बनाई थी।
सीएसआर मद के बजट से प्रभावित ग्राम पंचायतों को कुर्सी, टेंट, बर्तन आदि खरीद के लिए दो-दो लाख रुपये मुहैया कराने के अलावा इन गांवों में आजीविका परक प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जाने थे।
परियोजना चालू हुए दस साल बीत गए, लेकिन बांध प्रशासन प्रभावित गांवों को भूल गया। सीएसआर मद से गाजणा क्षेत्र की 22 ग्राम पंचायतों को वर्ष 2011-12 में 1-1 लाख रुपये दिए गए, लेकिन शेष 241 गांवों को धेला भी नहीं मिला। इन गांवों में टीएचडीसी की ओर से कोई रोजगारपरक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी नहीं चलाया जा रहा।
ग्रामीणों को उनका हक दिलाएंगे
विभिन्न स्रोतों से योजना के बारे में जानकारी जुटाने के बाद भाजपा नेता लोकेंद्र बिष्ट ने अब बांध प्रभावित गांवों को उनका हक दिलाने का बीड़ा उठाया है। मंगलवार को इस संबंध में शासन-प्रशासन को ज्ञापन प्रेषित करने के साथ ही उन्होंने पत्रकार वार्ता में कहा कि इसके लिए वे गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करेंगे।
जब ग्रामीण हितों को प्रभावित कर राष्ट्रहित में परियोजना तैयार की गई है, तो प्रभावितों को भी इसके लाभ में हक मिलना चाहिए। कंपनी की सीएसआर पॉलिसी में इसका प्राविधान होने के बावजूद लाभ नहीं दिया जाना क्षेत्र की जनता के साथ सौतेला व्यवहार है।