हरेला कार्यक्रम के तहत वनीकरण को बढ़ावा देने की सरकार की मुहिम निश्चित तौर पर सराहनीय है, लेकिन दो माह पहले चली आंधी में धराशायी हुए पेड़ों की सुध नहीं ले जा रही है। अकेले उत्तरकाशी वन प्रभाग में शुरूआती गणना में 4229 पेड़ गिरने की पुष्टि हुई, जिसकी बाजार कीमत करीब 25 करोड़ से ज्यादा की है।
बता दें कि बीते मई में चली तेज आंधी में जनपद सहित पूरे उत्तराखंड के जंगलों में चीड़, देवदार, कैल आदि के पेड़ बिछ गए थे। तब वन विभाग के अफसरों ने स्वीकार कि आंधी से करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। अकेले उत्तरकाशी वन प्रभाग में शुरूआती गणना में 4229 चीड़ आदि के पेड़ों के गिरने की पुष्टि हुई।
बीते एक माह से मानसून सीजन में वन विभाग सरकार के हरेला कार्यक्रम के तहत जगह-जगह पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण की मुहिम में जुटा है, लेकिन अभी तक इमारती लकड़ी के रूप में जंगलों में बिखरे पड़े खजाने की कोई सुध नहीं ली गई।
वन प्रभाग के डीएफओ गिरीश रस्तोगी ने बताया कि जल्द ही वन निगम के डीएलएम की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की बैठक बुलाकर तूफान में गिरे पेड़ों के आवंटन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। टौंस वन प्रभाग के डीएफओ संदीप कुमार एवं अपर यमुना वन प्रभाग के डीएफओ डीके सिंह ने बताया कि अभी आंधी में गिरे पेड़ों की गणना चल रही है।
बहुमूल्य हैं जंगलों में गिरे पड़े
वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक जंगल में गिरे पड़े और जड़पट सूखे पेड़ वन विभाग की ओर से छपान कर वन निगम को आवंटित किए जाते हैं। वन निगम चीड़ के पेड़ की ढाई हजार रुपये प्रति घनमीटर की दर से रायल्टी वन विभाग को देता है, जबकि इसका चिरान एवं ढुलान भाड़ा तथा वन निगम का मुनाफा आदि जोड़कर बाजार में चीड़ की लकड़ी 15 हजार रुपये प्रति घनमीटर की दर से बिकती है। देवदार की लड़की का भाव करीब 25 हजार रुपये प्रति घनमीटर है। एक औसत आकार के पेड़ में कम से कम तीन घनमीटर लकड़ी निकलती है।