इस बार मानसून सीजन में बेहद कम बारिश होने से जिले में खरीफ की धान और दलहनी फसलों को भारी नुकसान हुआ है। सिर्फ फसलें ही नहीं ग्रामीणों के समक्ष मवेशियों के लिए चारे की समस्या भी खड़ी हो गई है। फसलें बर्बाद होने से मायूस किसानों ने सरकार से सूखे से हुई क्षति का आकलन कर क्षतिपूर्ति की मांग की।
जिले में इस बार मानसून सीजन में बीते सालों में मुकाबले बहुत कम बारिश हुई, जिससे खरीफ की फसलों को भारी नुकसान हुआ। असिंचित खेतों में लगाई गई धान की फसल पर बालियां भी नहीं आईं। अब कटाई के सीजन में किसान सिर्फ पराली के लिए ही यह फसल काट रहे हैं। इसके अलावा मंडुआ, झंगोरा एवं चौलाई के साथ ही राजमा, गहत, उड़द, तोर आदि दलहनी फसलें भी बारिश के अभाव में बर्बाद हो गई हैं। कम बारिश से जंगलों में घास भी नहीं हुई। रवाईं घाटी के दयाचंद रमोला, चैन लाल, नरेश आदि किसानों ने बताया कि इस समय ग्रामीण खेतों के आसपास एवं जंगलों से घास काटकर अपने मवेशियों के लिए चारा पत्ती जुटाते थे, जो सर्दियों में काम आती थी, लेकिन इस बार चारा पत्ती भी नहीं मिल पा रही है।
खरीफ सीजन में हुई महज 135 मिमी बारिश
चिन्यालीसौड़। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी अधिकारी डा. पंकज नौटियाल ने बताया कि धान के लिए 800 से 1000 मिमी, दलहनी फसलों के लिए 500-750 मिमी और मोटे अनाजों के लिए 350-500 मिमी बारिश की आवश्यकता होती है। जबकि इस बार खरीफ सीजन में महज 135 मिमी बारिश ही हुई है, जिससे फसलों को काफी नुकसान पहुंचा है। उन्होंने सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जल संचयन टैंक, पूरक सिंचाई, सूक्ष्म सिंचाई आदि प्रणाली अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि परती भूमि में ऊंची क्यारियां बनाकर काफी हद तक सूखे से निपटा जा सकता है। साथ ही किसानों को कम पानी की जरूरत वाली फसलें अपने खेतों में लगानी चाहिए। उन्होंने फसल काटने के बाद अवशेषों को खेतों में नहीं जलाने की अपील की।