कभी तिब्बत के साथ व्यापार का साक्षी रहा ‘बाड़ाहाट का थौलु’ बदलते समय के साथ ‘माघ मेला’ के नाम से विकासोन्मुख हो रहा हो, लेकिन बड़े बुजुर्गों के जेहन में आज भी थौलु की पुरानी समृद्ध यादें ताजा हैं। वे व्यावसायिकता की आंधी में खोती जा रही परंपरा और स्थानीय उत्पादों की उपेक्षा से खिन्न हैं।
हर्षिल निवासी सुरेंद्र सिंह बुटोला (84) बताते हैं कि उन्होंने नेलांग और हर्षिल में तिब्बत के लोगों के साथ व्यापार किया। तब तिब्बत के व्यापारी भेड़-बकरी, घोड़े और याक पर लादकर ऊन, रेशम, पशमीना, हींग, नमक, मूंगे की माला आदि सामान लेकर आते थे और वस्तु विनिमय कर यहां से कुट्टू का आटा, जौ, गेहूं, चावल आदि अनाज ले जाते थे।
सत्यप्रकाश बिजल्वाण (68) बताते हैं कि राजशाही के समय से ही मकर संक्रांति पर बाड़ाहाट में लगने वाले थौलु में जुटने वाली भीड़ से आकर्षित होकर तिब्बत के व्यापारी पहुंचते थे।
बुजुर्ग बताते हैं कि मेले में रातभर अलाव जलाकर लोक गीत गूंजती थे। भैरवचौक स्थित चमाला की चौरी पर देव डोलियों का मिलन अलौकिक होता था।
कोट..
पौराणिक माघ मेले में देव डोलियों के नृत्य, स्नान एवं हाथी का स्वांग आदि परंपराओं को जीवंत रखने का प्रयास किया जा रहा है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भी क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस बार मेले में स्थानीय उत्पाद एवं व्यंजनों के लिए अलग स्टाल मुहैया कराए गए हैं।
जशोदा राणा, अध्यक्ष जिला पंचायत उत्तरकाशी।