नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के प्राचार्य कर्नल अजय कोठियाल के सहयोग से तैयार ग्रीन पिपुल संगठन ने स्थानीय लोगों की सहभागिता से विकसित नागटिब्बा बकरी गांव में पाली जा रही स्थानीय प्रजाति की बकरियों से जमुनापारी व बरबरी जैसी दुधारू नस्ल तैयार करने की मुहिम शुरू की है।
इससे उत्तराखंड में बकरी पालन से रोजगार के बड़े अवसर पैदा होने की संभावना बढ़ेगी। टाटा फाउंडेशन के सर्वेक्षण में उत्तराखंड में 13 लाख के करीब भेड़ बकरियां है। इस स्थिति को स्थानीय लोगों के हित में भुनाने के लिए संगठन की नागटिब्बा बकरी गांव के अतिरिक्त राज्य के पर्वतीय जिलों में 13 ऐसे केंद्र विकसित करने की योजना है।
ग्रीन पिपुल संगठन ने शुरुआत में टिहरी जिले की सिलवाड़ लालूर व इडवालस्यू पट्टी और इससे लगी उत्तरकाशी जिले की गोडर खाटल पट्टी में स्थानीय प्रजाति की बकरियों को दुधारू नस्ल की बकरियों में बदलने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। इसके लिए पंतवाड़ी में दस-दस जमुनापारी और बरबरी बकरे लाकर उनसे तैयार शंकर नस्ल को पंतवाड़ी में पनपा कर छह माह बाद नागटिब्बा पहुंचाया जाएगा। संगठन ने अभी देहरादून के विभिन्न हिस्से में सौ लोगों तक स्थानीय बकरी का दूध पहुंचाना शुरू कर दिया है।
नई दिल्ली में 400 रुपए गिला तक बिका
उत्तरकाशी। नई दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में फार्मेसिस्ट उत्तरकाशी के दीपक भद्री को सितंबर में डेंगू हुआ। इस अस्पताल में ही डेंगू के कहर के दौरान करीब एक हजार मरीज आए। यहां बकरी का दूध 400 रुपये गिलास तक बिका। अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि बकरी के दूध में डेंगू के मरीज के खून में प्लेटलेट्स की कमी की भरपाई करने की अद्भुत क्षमता है। भद्री को दूध की कमी के कारण अपने घर उत्तरकाशी आकर एक सप्ताह तक यहीं बकरी का दूध पीकर अपनी जान बचानी पड़ी।
डेंगू ही नहीं देश में पनप रहे खानपान की पांचतारा संस्कृति के कारण बकरी के दूध व इससे बनी उत्पाद की भारी मांग है। यहां नस्ल सुधार, दुग्ध उत्पादन, संग्रह और विपणन का काम स्थानीय युवाओं की सहभागिता से कर रहे है।
- रुपेश राय, प्रमुख ग्रीन पिपुल संगठन