मानसून सीजन की बारिश असी गंगा घाटी के सात गांवों पर आफत बनकर बरसी है। भूधंसाव के चलते भंकोली और ढासड़ा गांव के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
बरसात सीजन में इन गांवों के अधिकांश परिवार छानियों में शरण लेने को मजबूर हैं। इसके बावजूद इन गांवों को पुनर्वास की सूची में शामिल नहीं किए जाने से ग्रामीण स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
अगस्त 2012 के बाद से निरंतर आपदा की मार झेल रहे असी गंगा घाटी के गांवों में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। सौ परिवारों वाले भंकोली गांव के ऊपरी हिस्से में भूधंसाव से पेड़ उखड़ रहे हैं।
हर साल यहां बड़ी मात्रा में कृषि भूमि भूधंसाव की भेंट चढ़ रही है। बीते रोज घट्टूगाड में आए उफान से गांव का संपर्क मार्ग और पुलिया तबाह होने से गांव अलग-थलग पड़ गया है। बीते चार सालों में हर साल बरसात में यही मंजर रहता है। इसके चलते अधिकांश ग्रामीण छानियों और कुछ गंगोरी में बने मकानों में शरण लेने को मजबूर होते हैं। कमोबेश यही स्थित इस घाटी के ढासड़ा गांव की भी है।
क्षेत्र के शूरवीर रावत, रमेश रावत, महादेव सिंह आदि ने बताया कि बरसात सीजन में गांव में रहने पर जान का जोखिम बना रहता है। पूर्व में भूवैज्ञानिकों ने इन गांवों का सर्वेक्षण कर खतरे के प्रति आगाह किया था।
हैरानी की बात है कि अब सरकार द्वारा तैयार की गई पुनर्वास की सूची में इन गांवों का नाम ही शामिल नहीं है। ग्रामीण स्वयं सक्षम नहीं हैं, इसलिए पलायन नहीं कर पा रहे।
फिलहाल तो वे किसी तरह छानियों और अन्य सुरक्षित ठिकानों पर शरण लिए हैं, यदि समय रहते इन गांवों का पुनर्वास नहीं किया गया तो यहां आपदा में जान-माल के बड़े नुकसान की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।