उत्तरकाशी। इस बार बर्फबारी जल, जंगल, जमीन के लिए फायदेमंद माना जा रहा है, लेकिन हिमाच्छादित इलाकों में पालतू व लावारिस मवेशियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
हर्षिल घाटी में अब भी खेत, बागीचे, चरागाहों में कई फीट बर्फ जमी है। पहले मोरी, यमुनोत्री एवं गंगोत्री घाटी में ग्रामीण जाड़ों में अपने व मवेशियों के लिए एक माह के पर्याप्त भोजन की व्यवस्था करते थे और फिर मौसम खुलने पर मवेशियों को चरागाह में छोड़कर या पेड़ों से पत्तियों का चारा जुटाते थे। इस बार बर्फबारी का सिलसिला निरंतर जारी रहने से यह मौका नहीं मिला। अब ग्रामीण दूध देने वाले मवेशियों को पहले से जमा चारा खिला रहे हैं, लेकिन दूध न देने वाली गाय, बैल, बछड़े व बछिया को बाहर खुले में छोड़ दिया है। सुक्की के मोहन सिंह, झाला के जयपाल सिंह, जसपुर के सोनू रौतेला, हर्षिल के डा. नागेंद्र रावत का कहना है कि पशुपालन विभाग भले ही पैसा ले, लेकिन गोवंशीय मवेशियों को बचाने के लिए उन्हें भूसा भेली आदि चारा क्षेत्र के किसानों को उपलब्ध कराना चाहिए। सदस्य राज्य पशु क्रूरता निवारण समिति के सदस्य चंद्र सिंह का कहना है कि इस संबंध में मुख्य सचिव एवं पशुपालन सचिव से वार्ता की है। प्रशासन को भी गांवों में सर्वे कर मृत एवं लावारिस मवेशियों की संख्या पता करने के साथ ही सर्दियों में चारा प्रबंधन को लेकर प्रधानों से मिलकर उचित योजना बनानी चाहिए।
सर्दियों में हिमाच्छादित क्षेत्रों में चारे की समस्या को देखते हुए भटवाड़ी और मोरी के पशु अस्पतालों में 250-250 भूसा भेली उपलब्ध कराई गई है। 102 रुपये प्रति भेली की दर से यह ग्रामीणों को दी जानी है।
डा. प्रलयंकर नाथ, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी उत्तरकाशी।