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प्रसूताओं की जिंदगी के प्रति संवेदनशील नहीं सरकार एवं स्वास्थ्य महकमा

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उत्तरकाशी। जिले की आधी आबादी महिलाओं की सेहत को लेकर सरकार एवं स्वास्थ्य महकमा कतई गंभीर नहीं है। यूं तो जिले में दस स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसव कराने की व्यवस्था है, लेकिन जिला अस्पताल को छोड़कर शेष स्वास्थ्य केंद्रों पर सामान्य प्रसव ही हो पाते हैं। आपदा के दौरान सड़क एवं पैदल रास्ते क्षतिग्रस्त होने पर गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाना ही महाभारत होता है। केस बिगड़ने पर देहरादून हायर सेंटर रेफर करने की स्थिति महिला के साथ ही गर्भस्थ शिशु के लिए भी जानलेवा साबित होती है। बीते साल ही जिले में प्रसव के दौरान पांच महिलाओं की मौत हो चुकी है।
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जनपद में जिला अस्पताल के साथ ही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चिन्यालीसौड़, बड़कोट, नौगांव एवं पुरोला, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भटवाड़ी, डुंडा, मोरी तथा स्वास्थ्य केंद्र ब्रह्मखाल एवं सांकरी में प्रसव कराने की सुविधा है। जिला अस्पताल को छोड़ अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसव की जिम्मेदारी स्टाफ नर्स और एएनएम पर है और इनके भी अधिकांश पद रिक्त होने से ये स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ रेफरल सेंटर बने हुए हैं। जिला अस्पताल पर भटवाड़ी, डुंडा एवं चिन्यालीसौड़ ब्लाक के साथ ही टिहरी जनपद के प्रतापनगर क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाएं टिकी हैं। यहां गायनोकोलॉजिस्ट समेत अन्य चिकित्सक एवं स्टाफ नर्स तैनात होने से लोगों को काफी सहूलियत होती है।
उधर, मोरी क्षेत्र के लोग तो प्रसव के लिए महिलाओं को त्यूनी देहरादून एवं रोहड़ू (हिमाचल प्रदेश) ले जाने को मजबूर होते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के आंकड़ों पर नजर डालें तो जिले में औसतन प्रतिमाह 200 से 300 प्रसव के मामले आते हैं। वर्ष 2017-18 में जिले से प्रसव के लिए 397 महिलाओं को हायर सेंटर रेफर किया गया। इस साल भी अप्रैल-मई माह में 74 केस रेफर हुए। बीते साल जिले में प्रसव के दौरान पांच महिलाएं काल के गाल में समा चुकी हैं। इन मामलों में चिकित्सक प्रसूता के प्रति परिजनों की लापरवाही को ही कारण बताते हैं। प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचने में देरी के कारण कई महिलाओं का प्रसव तो रास्ते में ही होने की स्थिति भी जिले में आ चुकी है। वर्ष 2012 एवं 2013 की आपदा के दौरान रास्ते बंद होने से गर्भवती महिलाओं को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। अब भी रास्तों की दशा के हालात में कोई सुधार नहीं है, लेकिन महिलाओं की जान के प्रति शासन-प्रशासन अथवा स्वास्थ्य महकमा कतई गंभीर नजर नहीं आ रहा है।
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