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मौसम परिवर्तन के साथ बदल रहा सेब का फसल चक्र

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उत्तरकाशी। मध्य हिमालयी क्षेत्रों के मौसम परिवर्तन का प्रभाव अब सेब की फसल चक्र में भी दिखने लगा है। सेब की फसल में आए इस बदलाव से पहले पतझड़ और गलत समय पर फलों की पैदावार हो रही है। इससे पैदावार में गिरावट आने के साथ ही काश्तकारों को भी नुकसान हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टि के चलते हर्षिल क्षेत्र की करीब 60 प्रतिशत फसल में बीते दो-तीन वर्षों में यह बदलाव देखने को मिल रहा है।
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सहायक उद्यान अधिकारी एवं सेब विशेषज्ञ एनके सिंह के अनुसार सेब उत्पादन क्षेत्रों में आमतौर पर दिसंबर-जनवरी में बर्फबारी व बारिश होने के साथ ही सेब के पेड़ सुप्त अवस्था से निकलकर अपने प्रजनन चक्र को शुरू करते हैं। इसके तहत मार्च में फ्लावरिंग और मई में फ्रूट सेटिंग होने के बाद सितंबर- अक्तूबर में फसल तैयार होती है, जिसके बाद पतझड़ होते ही एक बार फिर यह चक्र शुरू हो जाता है।
लेकिन बीते कुछ सालों से कम बर्फबारी व मार्च से मई तक के महीनों में बारिश और ओलावृष्टि होने से सेब के पेड़ों में बदलाव आ रहे हैं। इसके चलते कई पेड़ों में मई-जून में ही पतझड़ हो रहा है और नवंबर-दिसंबर में फल आ रहे हैं। जो निम्न गुणवत्ता के होने के कारण खराब हो जाते हैं।
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सेब की 20 प्रतिशत फसल हुई बर्बाद
फ्लावरिंग और फूट सेटिंग सीजन के दौरान हुई ओलावृष्टि के कारण जनपद की करीब 20 प्रतिशत सेब की फसल बर्बाद हो गई है। उद्यान विभाग के सहायक अधिकारी एनके सिंह के अनुसार मोरी, पुरोला और आराकोट क्षेत्र में ज्यादा नुकसान हुआ है, जबकि उपला टकनौर क्षेत्र में करीब 15 से 20 फीसदी का नुकसान हुआ है। वहीं, नाशपाती और पुलम की फसल को भी करीब 15 से 20 प्रतिशत का नुकसान पहुंचा है, जबकि अखरोट की फसल में मात्र 2-3 प्रतिशत का नुकसान हुआ है। उन्होंने काश्तकारों को बोरेक्स, यूरिया और फंगीसाइड के मिश्रण का पेड़ों पर छिड़काव करने की नसीहत दी है।
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