उत्तरकाशी। जनपद के ऊंचाई वाले सेब उत्पादक क्षेत्रों में फ्लावरिंग सीजन अभी 15 दिन दूर है, जबकि निचले इलाकों में उगाई गई अन्ना प्रजाति के सेब के पेड़ फलों से लद गए हैं। प्रकृति का वरदान साबित हुई सेब की इस प्रजाति को अगर पूरे प्रदेश में वृहद रूप से प्रचारित किया जाए, तो काश्तकारों को काफी मुनाफा हो सकता है।
हर्षिल, मुखबा सहित उपला टकनौर में सेब की पारंपरिक प्रजातियों को उगाया जाता है। रोयल डिलिशियस, रेड डिलिशियस आदि प्रजाति के इन पेड़ों को अच्छे उत्पादन के लिए 1200 से 1600 घंटों तक सात डिग्री से कम का न्यूनतम अवशीतन तापमान चाहिए होता है, लेकिन इस वर्ष दिसंबर-जनवरी में नहीं के बराबर बारिश बर्फबारी होने से फसलों को काफी नुकसान हुआ है। अन्ना प्रजाति के सेब को मात्र 200 से 400 घंटे तक ही न्यूनतम अवशीतन तापमान की जरूरत होती है। गोल्डन डिलिशियस से विकसित की गई इस प्रजाति के सेब को 800 मीटर तक के ऊंचाई वाले इलाकों में उगाया जा सकता है। यह प्रजाति तीन साल में ही फल देना शुरू कर देती है। चिन्यालीसौड़ कृषि विज्ञान केंद्र में सैंपल के तौर पर लगाए गए इन पेड़ों में फ्लावरिंग सीजन गुजरने के बाद फल आने लगे हैं, जो आगामी जून तक पूरी तरह तैयार हो जाएंगे।
कोट:
शीतकाल में जरूरत से कम बारिश बर्फबारी होने से सेब की पारंपरिक प्रजातियों को काफी नुकसान पहुंचने की संभावना है। जरूरी न्यूनतम अवशीतन तापमान नहीं मिलने से सेब के आकार, रंग, स्वाद आदि में प्रभाव पड़ सकता है, जबकि अन्ना प्रजाति के पेड़ मौसम के बदलावों से अधिक प्रभावित नहीं होते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र में लगे पेड़ों पर फल आने लगे हैं।
डा. पंकज नौटियाल, सेब विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र चिन्यालीसौड़।