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भेड़पालन से तौबा करने को मजबूर हो रहे ग्रामीण

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उत्तरकाशी। राज्य के भेड़ पालन व ऊन उद्योग में उत्तरकाशी के भेड़ पालक आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। सरकारी अनदेखी, चारागाहों की कमी और ऊन खरीद के नए मानकों के चलते भेड़ पालकों को नुकसान हो रहा है। ऐसे में कई भेड़ पालक से इससे तौबा करने लगे हैं।
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भेड़ पालन से जुड़े बगोरी के प्रधान भगवान राणा, चैन सिंह, जगत नेगी, नारायण सिंह, जयपाल रावत ने बताया कि कुछ साल पहले तक करीब 115 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकने वाली ऊन वर्ष 2016-17 में खादी बोर्ड द्वारा 45 से 70 रुपये की दर से खरीदी गई, जबकि वर्ष 2017-18 में उत्तराखंड भेड़ एवं ऊन विकास बोर्ड द्वारा नए मानक तय करने के बाद ऊन का औसत दाम 50 रुपये प्रति किलो रह गया। ग्रामीणों को सारी ऊन एक निजी संस्था को औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ी। चारागाहों और कृषि भूमि की कमी के चलते भेड़ पालक पहले ही कठिनाई में जी रहे थे, ऐसे में नए मानकों के बाद मुसीबत और बढ़ गई है।
उत्तरकाशी क्षेत्र में अमूमन 60 से 65 मिलीमीटर लंबाई और 27 से 29 माइक्रोन मोटाई की ऊन मिलती है। विभाग द्वारा ग्रामीणों की समस्या को देखते हुए दाम बढ़ाने का प्रयास किया गया था, लेकिन विश्व बाजार में ऊन के दाम गिरने एवं गुणवत्ता के आधार पर मानक तय होने के बाद यह संभव नहीं हो पा रहा है। -सुरेंद्र सिंह बौनाल, क्षेत्रीय अधीक्षक खादी बोर्ड।
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पहले बिना किसी मानक के ऊन खरीदी जाती थी, जिससे करीब 7 करोड़ की ऊन डंप पड़ गई। इससे सरकार के साथ ही भेड़ पालकों व खरीददारों को भी नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में शीप बोर्ड ने मानक तय कर बिचौलियों को हटाने की व्यवस्था बनाई है। समय के साथ इसके अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे।
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डा. अशोक लीलाधर बिष्ट, अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी, भेड़ एवं ऊन विकास बोर्ड।
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