उत्तरकाशी। रामलीला मैदान में आयोजित दो दिवसीय मंगसीर बग्वाल का शुभारंभ हो गया है। पहले दिन विभिन्न प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें स्कूली बच्चों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
अनघा माउंटेन एसोसिएशन की ओर से आयोजित दो दिवसीय मंगसीर बग्वाल का शुभारंभ भाजपा के राष्ट्रीय सचिव तीरथ सिंह रावत ने किया। उन्होंने एसोसिएशन के इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि मंगसीर बग्वाल हमारी पहाड़ी दीपावली है, जो आज भी गांव में मनाई जाती है। आज नई पीढ़ी इस दीपावली को भूल रहे हैं, जिसे हमें बचाने की जरूरत है। इस दौरान स्कूली बच्चों की विभिन्न प्रतियोगिताएं कराई गईं। गढ़ चित्रण प्रतियोगिता में अदिति भारती प्रथम, ऋषभ राणा द्वितीय, अनुष्का तृतीय स्थान पर रही। गढ़ भाषण में ओम राणा प्रथम, रचना आर्य द्वितीय, बबीता और कोमल तृतीय स्थान पर रहीं। गढ़ निबंध में श्रुति सेमवाल प्रथम, ईशा नौटियाल द्वितीय, संतोषी भट्ट तृतीय स्थान पर रहीं। रस्साकशी में महार्षि विद्या मंदिर प्रथम, ब्राइट एजूकेशन एकेडमी द्वितीय तथा गोस्वामी गणेश दत्त विद्या मंदिर इंटर कॉलेज तृतीय स्थान पर रहे। इस दौरान सरकारी व गैरसरकारी स्टाल भी लगे हुए थे। इस मौके पर एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय पुरी, विजय संतरी, शैलेंद्र मटूडा, अशोक सेमवाल, नेमचंद चंधोक, डा.शभु नौटियाल, प्रताप बिष्ट, राघवेंद्र उनियाल आदि मौजूद थे।
यमुनाघाटी में 56 गांव के ग्रामीण मनाते हैं देवलांग त्यौहार
बड़कोट।
मंगसीर की बग्वाल (दीपावली) यमुना घाटी में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। रंवाई क्षेत्र के गैर बनाल में करीबन 56 गांवों के ग्रामीण इस देवलांग पर्व के रूप में मनाते है। 18 नवंबर रात को होने वाले इस पर्व में बड़ी संख्या में बाहर रहे रहे ग्रामीण अपने गांव आते है।
गोरखा युद्ध के समय मलेथा गांव के वीर भड माधो सिंह भंडारी की विजयी हो कर वापस लौटे थे। जिनकी खुशी में कार्तिक मांस की दीपावली को न मना कर मंगसीर मास की दीपावली यानी बग्वाल मनाई जाती है। गैर बनाल के अलावा कोटी गगंटाडी में भी देवलांग मंगसीर की बग्वाल को विशेष तौर से मनाया जाता है। बनाल क्षेत्र में साठी और पानसाई थोक है। जो दो दलों के रूप में गैर गांव में रात्री को पहुंचते है और दोनो ही दल जंगल से लाए गए देवदार के हरे वृक्ष को डंडो के बल पर खडा करते हुए एकत्रित ग्रामीणों द्वारा उस पर आग लगा दी जाती है। इस अनोखे पर्व को मनाने के लिए ग्रामीण एक माह पूर्व जगंल से सूखी लकडी के छिलके लाकर राजा रघुनाथ मदिर परिसर में लाकर रखते है। जिसे फिर देवदार के वृक्ष पर बांध कर सुबह होते ही ढोल नगाडो की थाप पर और लोक नृत्य के साथ डंडो के बल पर अग्निकुंड में खडा कर दिया जाते है। फिर मौजूद ग्रामीणों द्वारा आग लगाई जाती है। देवलांग का यह पर्व खुशहाली का प्रतीक भी कहा जाता है। इस अनोखे पर्व को मनाने एवं देखने के लिए दूरदराज से छिलकों के मशाल के साथ ग्रामीण गैर पहुंचते है और यह राजा रघुनाथ मंदिर में पूजा अर्चना कर फिर देवलांग के पर्व में शिरकत करते है।