उत्तरकाशी। ‘सच्चा कलाकार वो नहीं जो वस्तुओं से प्रेरणा ले, बल्कि वो है जो दूूसरों को प्रेरित करे’, यह वाक्य अगोड़ा गांव के चंद्रलाल पर खरे उतरते हैं, जिन्होंने अपनी काष्टकला से देश-विदेश में पहचान बनाने के साथ ही कई ग्रामीणों को स्वरोजगार से जोड़ा है। ये इनका जुनून ही था कि गरीब परिवेश से निकलकर उन्होंने 2016 में उत्तराखंड शिल्प रत्न जैसा सम्मान हासिल किया और देश के कई बड़े शहरों में प्रदर्शनी लगाई।
महज 8वीं कक्षा पास कलाकार द्वारा बनाए गए बदरीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री मंदिरों के 13 फिट ऊंचे मॉडलों ने इन्हें अलग पहचान दिलाई थी। चंद्रलाल के हुनर को देखते हुए जिला उद्योग विभाग ने उन्हें लंदन के बर्मिंघम में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी में भी भेजा था। सितंबर में आयोजित इस प्रदर्शनी में चंद्रलाल के लाइव प्रदर्शन को विदेशियों द्वारा बहुत पसंद किया गया था।
चंद्रलाल ने बताया कि उनके पिता व दादा वन विभाग द्वारा दी गई लकड़ियों से घर आदि बनाते थे, जिससे बचपन में ही उनका झुकाव इस तरफ हो गया था। लेकिन इस क्षेत्र में कुछ नया करने की चाह से उन्होंने लकड़ी के खिलौने व बर्तन आदि बनाने शुरू कर दिए। शुरुआत में कोई आय ने होने से लोग उन्हें पागल समझकर मजाक उड़ाते थे। लेकिन कुछ समय बाद गांव में आए पर्यटकों ने उनकी कला को बहुत पसंद किया। इसके बाद कई और लोग भी इन कलाकृतियों को खरीदने लगे। यह उनकी कला का प्रभाव ही था की ग्रामीणों ने 2014 में उन्हें अगोड़ा का प्रधान बना दिया। पहचान मिलने के साथ ही उन्होंने रौशनाबाद जेल, गुरुकुल कांगड़ी, उत्तरकाशी महाविद्यालय आदि जगहों में इस कला के गुर भी सिखाए। वर्तमान में अगोड़ा, ब्रह्मखाल आदि गांवों के करीब 30 लोग उनसे प्रशिक्षण ले रहे हैं, जो इन कलाकृतियों को बेचकर करीब 20 हजार रुपये प्रति वर्ष तक कमा रहे हैं। वहीं उनके द्वारा सिखाए गए संतराम व सुमन तो दिल्ली और देहरादून में प्रदर्शनी भी लगा चुके हैं। चंद्रलाल का कहना है कि विदेशों और बड़े शहरों में इन कलाकृतियों को बहुत पसंद किया जाता है। अगर सरकार ग्रामीणों को प्रशिक्षण देकर कारखाने व दुकानें खोले, तो बहुत सारे ग्रामीणों को रोजगार मिल सकता है।