फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गंगा के नॉन प्यूट्रिफाइंग गुण की तलाश शुरु, गोमुख से गंगा सागर तक शोध कर रहा नीरी संस्थान

विज्ञापन
विज्ञापन
उत्तरकाशी। नमामि गंगे परियोजना के तहत राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की ओर से गंगा के नॉन प्यूट्रिफाइंग गुण को समझने के लिए शोध किया जा रहा है। नॉन प्यूट्रिफाइंग गुण की वजह से ही गंगा का पानी कभी सड़ता नहीं है। आस्थावान लोग इसे देव शक्ति मानते हैं, जबकि वैज्ञानिक तर्क ढूंढ रहे हैं।
विज्ञापन

शोध दल के प्रोजेक्ट लीडर डा. कृष्णा कैरना ने बताया कि नमामि गंगे परियोजना के तहत नीरी को शोध कार्य के लिए चुना गया है। इसमें आईआईटी रुड़की, एनसीएल पूणे, आईसीएमआर संस्थान की ओर से भी सहयोग किया जाएगा। दो साल तक चलने वाले शोध में गोमुख से गंगा सागर तक 128 स्थानों पर सैंपल लिए जाएंगे। करीब 2550 किमी लंबे गंगा पथ को तीन जोन में बांटा गया है, जिसमें गोमुख से हरिद्वार तक अपर स्ट्रैच, हरिद्वार से वाराणसी तक मिडिल स्ट्रैच तथा वाराणसी से गंगा सागर तक लोअर स्ट्रैच बनाया गया है। उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के भी सैंपल लिए जाएंगे। इन सभी सैंपलों की जांच के बाद गंगा जल को सड़ने से बचाने वाले तत्वों का पता चलेगा।

बॉक्स:
गंगा जल के विशेष गुण
विशेषज्ञों के अनुसार गंगा नदी में यमुना व नर्मदा नदियों के मुकाबले काफी अधिक मात्रा में अच्छे बैक्टीरिया व वायरस पाए जाते हैं, जो अन्य हानिकारक तत्वों को खत्म कर देते हैं। गंगा में प्रचूर मात्रा में जड़ी बूटियां व खनिज पाए जाते हैं। गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा भी बहुत अधिक होती है। इन्हीं वजहों से इसको अमृत का दर्जा मिला है, लेकिन बढ़ते प्रदूषण व बांधों के कारण इसके प्रवाह में कमी आने से इन गुणों को नुकसान पहुंच रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें