उत्तरकाशी। पुरोला और मोरी क्षेत्र के मशहूर लाल धान (चरदान) को अब नई पहचान देने की तैयारी है। कृषि विभाग इसे जीआई (जियोग्राफिक्ल इंडिकेशन) टैग दिलाने का प्रयास कर रहा है। विभाग ने इसके लिए कृषि सचिव को पत्र भेजा है। अगर क्षेत्र के लाल धान को जीआई टैग मिल जाता है तो यह उत्पाद एक ब्रांड बन जाएगा। इससे इसके मूल्य और उत्पादन में बढ़ोतरी करने के लिए कई तरह के कार्य हो पाएंगे। वहीं, इसे उगाने वाले किसानों को भी इससे बहुत फायदा होगा।
मुख्य कृषि अधिकारी महिधर सिंह तोमर ने बताया कि लाल धान को जीआई टैग के लिए कृषि सचिव को पत्र भेजा गया है। उनसे किसी संस्था को चुनने का निवेदन किया है जो जीआई टैग के लिए रिपोर्ट तैयार कर सके। यह रिपोर्ट चेन्नई स्थित जियोग्राफिकल इंडिकेशन को भेजी जाएगी, जो इस पर अंतिम फैसला लेगी।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में पुरोला और मोरी के करीब 2500 हेक्टेयर क्षेत्र में लाल धान की खेती होती है। अगर इसे जीआई टैग मिल जाता है तो अंतराष्ट्रीय बाजार में यह एक ब्रांड बन जाएगा।
आयरन प्रोटीन एंटी ऑक्सीडेंट की होती है प्रचुर मात्रा
चरदान की खेती करने वाले नेत्री गांव के विजेंद्र सिंह राणा ने बताया कि यह अनाज सदियों से हमारे क्षेत्र में उगाया जा रहा है। जैविक तरीके से उगाए जाने वाले इस धान में आयरन, प्रोटीन, पोटैशियम, फाइबर और एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होता है। यह दिल, हड्डी, मोटापे और अस्थमा आदि बिमारियों से बचाता हैं। जानकारों के अनुसार कंवलसराई क्षेत्र में यह फसल सबसे पहले उगाई गई थी। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी इसका उत्पादन होने लगा, लेकिन बीते कुछ सालों से इसके उत्पादन में गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण बीज का पुराना होना और पहाड़ों में तापमान का बढ़ना है। हिमाचल के खरीददार लाल चावल को 50-60 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीदते हैं।