भारत के अंतिम गांव माणा में भोटिया जनजाति के ग्रामीण इस अभूतपूर्व आपदा के बीच अग्नि परीक्षा से गुजर रहे हैं।
बदरीनाथ धाम के हकहकूक धारी यहां के ग्रामीणों पर बदरीनाथ धाम में बदरीविशाल को घृत कंबल बनाने और सावन माह में बदरीनाथ धाम में दीए जलाने की जिम्मेदारी होती है। साथ ही माणा गांव के ग्रामीण छह माह तक अपने अराध्य देव घंटाकर्ण की पूजा करते हैं। लेकिन इस बार ये ग्रामीण दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए हैं।
बीती 20 जून से तीर्थयात्रियों के लिए निशुल्क भंडारे का आयोजन भी किया, लेकिन अब उनके घरों का राशन भी समाप्त होने के कगार पर है। जिससे ग्रामीणों को खाद्यान्न संकट की डर सता रही है। माणा गांव में भोटिया जनजाति के 300 परिवार निवास करते हैं।
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बृहस्पतिवार की सुबह माणा गांव के निवासी बदरीनाथ में प्रशासन के अधिकारियों को मिलने आए, लेकिन प्रशासन का एक भी नुमाईंदा ग्रामीणों की सुनने को तैयार नहीं है। आपदा की इस घड़ी में माणा गांव के ग्रामीण दाने-दाने के मोहताज बने हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि 12 दिन गुजर जाने पर भी प्रशासन ने हमारी खैर-खबर नहीं ली है।
यह गांव भारत-चीन सीमा पर बसा हुआ है। यहां सेना का कार्यालय भी मौजूद है। लेकिन इन दिनों सेना और प्रशासन का ध्यान बदरीनाथ में फंसे तीर्थयात्रियों को निकालने पर है। जिससे माणा गांव के ग्रामीणों की पीढ़ा को कोई सुनने को तैयार नहीं है। माणा गांव के ग्रामीण ऊनी वस्त्रों का निर्माण के साथ ही आलू, राजमा, फरण का उत्पादन कर अपनी आजीविका चलाते हैं। लेकिन इस आपदा ने ग्रामीणों का यह रोजगार भी छीन लिया है। ग्रामीण आपदा की डर से खौफ खाए हुए हैं।
गांव की प्रधान गायत्री मोल्फा और पूर्व प्रधान पीतांबर मोल्फा का कहना है कि बदरीनाथ धाम पहुंचने वाला तीर्थयात्री माणा गांव जरुर पहुंचता है। वह हमसे ऊनी वस्त्र खरीदता है। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि बदरीनाथ हाईवे के बंद होने से तीर्थयात्री भी मायूस है और ग्रामीण भी। हमारा गांव नदी साइड से धंस रहा है। हम कहां जाएं, क्या करें, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। जिला प्रशासन ने ग्रामीणों को राहत सामग्री बांटने तक की जहमत नहीं उठाई है।