विजयनगर के बगड़ और पुराना देवल मंदिर मोहल्ले के लोगों ने कभी भी नहीं सोचा रहा होगा कि मंदाकिनी नदी की लहरें 50 मीटर ऊपर उठेंगी और सब कुछ अपने आगोश में ले लेगी।
यही स्थिति सिल्ली व उसके ठीक उसके सामने पूर्वी चाका और सौरगढ़ की है। नदी सड़क से कई मीटर ऊपर के मकानों को बहा ले गई है।
रुद्रप्रयाग से केदारनाथ तक लोगों पर जो विपदा आई। उसको शब्दों में बयां करना मुश्किल है। रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि तक मुझे जो देखने को मिला, वह किसी बुरे सपने से कम नहीं है। जहां कभी हम भ्रमण के दौरान चाय-पानी पीते थे, उनका कोई नामोनिशान नहीं था।
खाका बनने से पहले सब कुछ बर्बाद
हाल में अगस्त्यमुनि, विजयनगर, जवाहनगर, बनियाड़ी, ताली बगड़, सौड़ी और सिल्ली को मिलाकर नगर पंचायत अगस्त्यमुनि का गठन किया था। नवसृजित शहर के विकास के लिए योजनाओं का खाका बनने से पहले सब कुछ बर्बाद हो गया।
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अगस्त्यमुनि से वापसी करते हुए हम विजयनगर में खेतों के रास्ते आगे बढ़े। ठीक सामने देखा, तो देवल गदेरे के दूसरी ओर लोग खड़ी चढ़ाई पर खतरनाक रास्ते पर चल रहे थे।
एक बच्चे को दो लोग शायद जो उसके मां-बाप रहे होंगे, हाथ पकड़कर ला रहे थे। सड़क से लगभग 200 मीटर ऊपर तक खाई के कोने में मकान आधा लटक रहे थे। यहां के लोग अपने रिश्तेदारों के घरों में चले गए।
अगस्त्यमुनि का दृश्य पहले से बिल्कुल अलग
खेतों में स्थानीय लोग बिजली के तार खींचने में विद्युत कर्मियों की मदद कर रहे थे। थोड़ा ऊपर चढ़कर पूरे अगस्त्यमुनि का दृश्य दिखा, पहले से बिल्कुल अलग था।
विजयनगर में जहां नदी भवनों से 50 मीटर दूर थी, नदी पूर्व के रास्ते से हटकर 100 मीटर अंदर आ गई। वहीं अगस्त्यमुनि-विजयनगर के बीच कुछ स्थानों पर भवन बिल्कुल नदी के ऊपर थे।
नदी का प्रवाह वहां से 100 मीटर दूर हो गया। नदी के किनारे पत्थर और रेत के ढेर जमा हैं। कुछ मजदूर नदी से रेत भी निकाल रहे हैं।
इसके बाद हम जीआईसी अगस्त्यमुनि में स्थित रिलीफ कैंप में पहुंचे। यहां एसडीएम डा. ललित नारायण मिश्र और बीडीओ निशा वर्मा से मुलाकात होती है।
वर्मा बताती हैं कि रिलीफ सेंटर में छह परिवार रह रहे हैं। इन लोगों के पास कुछ नहीं रह गया है। मैं रिलीफ सेंटर जाता हूं। वहां जीआईसी रुद्रप्रयाग में चतुर्थ श्रेणी पद पर कार्यरत 58 वर्षीय मुखराम (मूल रूप से बिजनौर निवासी) के परिवार से मुलाकात होती है।
हमारे पास कुछ नहीं बचा
वह बताते हैं कि मेरा परिवार 50 सालों से पुराना देवल मोहल्ले में रह रहा था। 16 जून को उनकी जमा-पूंजी को मंदाकिनी अपने साथ बहा ले गई। हमारे पास कुछ नहीं बचा है।
किराए पर भी कमरा नहीं मिल रहा है। हमारा तो सामान गया ही, छुट्टियों में मायके आई बेटी और दामाद का सामान बाढ़ की भेंट चढ़ गया। इसके बाद हम आगे बढे़। रिलीफ सेंटर से थोड़ा आगे सौरगढ़ मुहल्ला है।
यहां भी 10 मकान और खेत नदी में बह गए। यहां पर मुझे नरोत्तम भट्ट, स्वयंबर कंडारी और महावीर मिलते हैं। महावीर बताते हैं कि मैं सीआरपीएफ में तैनात हूं। 28 जून को ड्यूटी पर जाना था।
ऐसे में कैसे जा पाऊंगा। सिल्ली से गुजरते हुए मेरे हाथ में डायरी और कैमरा देखकर नदी पार के लोग समझ जाते हैं कि मैं पत्रकार हूं।
हाथ के इशारों से अपनी समस्या शासन तक पहुंचाने का अनुरोध करते हैं। वे हमारे पास नहीं आ सकते हैं, क्योंकि पुल बह चुका है।
इसके बाद सिल्ली में इंटर कॉलेज के प्रवक्ता सुधाकर बेंजवाल और डीपी गोस्वामी से मुलाकात होती है। दोनों के भवनों के भूतल पानी में डूबे हुए हैं। पूर्व कनिष्ठ प्रमुख रमेश बेंजवाल भी बेघर हो गए हैं।
कभी दो मंजिला भवन थे
बेंजवाल नदी की दूसरी ओर चाका गांव की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि वहां पर कभी दो मंजिला भवन थे। 16 जून को सबसे पहले उनके मित्र केसरी नौटियाल का मकान पानी में बहा।
जबकि अन्य घर 17 जून को बहे। यहीं पर काग्रेस नेता महेंद्र नेगी से भेंट होती है। वह बताते हैं कि विजयनगर में उनका घर, हाल में खरीदी कार और जेसीबी मशीन को बाढ़ का पानी निगल गया।
अंधेरा हो रहा था और हमें नौला पानी (कुछ स्थानों को छोड़कर) तक पैदल सफर तय करना था। इसलिए हम लोगों से विदा लेते हुए तेजी से चलने लगे। चलते हुए जब मैंने एक बार मुड़कर देखा, तो लोगों की आंखों में तैरता दर्द मुझे अंदर तक झकझोर गया।
(रुद्र प्रयाग से अगस्त्यमुनि का भ्रमण करने के बाद संदीप थपलियाल की रिपोर्ट)