केदारनाथ जाने वाले रास्ते पर पड़ने वाला गांव चंद्रापुरी पूरी तरह से तबाह हो गया है। इस गांव में करीब 67 घर थे, जिनमें से 63 मकान पूरी तरह से मंदाकिनी की गोद में समा गये हैं। जहां कल तक घर, दुकान, मकान, अस्पताल थे, वहां आज मंदाकिनी दौड़ रही है।
जहां अभी तक प्रशासन नहीं पहुंच पाया, वहां सबसे पहले पहुँचा अमर उजाला फाउंडेशन। फाउंडेशन की टीम को देखकर गांव वालों की आंखें नम हो आईं। सरकार और प्रशासन के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। अमर उजाला फाउंडेशन जो राहत सामग्री लेकर गया था, उसे गाँव वालों को दिया। जिसका गांव वालों ने तहे दिल से स्वीकार किया।
जहां मकान थे वहां आज दौड़ रही है मंदाकिनी: यहां पर करीब 67 परिवार रह रहे थे। अब केवल चार मकान बचे हैं। बाकी सभी मंदाकिनी की गोद में समा चुके हैं। अपना मकान खो चुके वीरेंद्र कहते हैं, क्या कहूँ ...कुछ महीने पहले ही सेना से रिटायर हुआ था।
करीब 22 लाख रुपये लगाकर मकान बनाया था। शाम तक ऐसा लग रहा था कोई खतरा नहीं है। लेकिन रात होते-होते मंकाकिनी ने करीब चार सौ मीटर अंदर तक आकर उसने तबाही मचा दी, जिसकी कल्पना से ही सिहर उठते हैं। घर, गौशाला, दुकान सब कुछ पानी में स्वाहा हो गया। पिछले 15 दिनों से प्रशासन का कोई अधिकारी नहीं पहुंचा है। अब तक केवल लिस्ट भेजने को कहा है। चंद्रापुरी के हर घर की यही कहानी है।
क्या-क्या बह गया
वीरेंद्र ने बताया कि करीब 2 हजार वर्ग फीट का क्षेत्र को मंदाकिनी नें अपने में समा लिया। 63 मकानों के अलावा लोगों की 25 से 30 दुकाने, गौशाला, खेल का मैदान, मंदिर, एक स्कूल, पशु-पालन वालों का अस्पताल, पटवारी चौकी, पुल, एक लॉज, गढ़वाल मंडल विकास निगम का गेस्ट हाउस, आज थे हो चुके हैं। किसी को विश्वास ही नहीं होता कि यहां पहले कुछ रहा होगा। अब चंद्रापुरी में केवल मंदाकिनी ही दिखती है, बाकी कुछ नहीं।
परेशान और बेहाल हैं लोग
जैसे ही हम वहां पर पहुंचे लोगों ने हमें घेर लिए। हर चेहरा उदास है, हर किसी के आंखों में आज भी अनजान डर साफ देखा जा सकता है। कुछ लोगों ने उन घरों में आश्रय लिया है, जो बच गये हैं। उसके अलावा अन्य लोग किसी तरह से आसमान के नीचे जीवन जी रहे हैं। शाम से ही इस बात का अंदेशा होने के बावजूद अपने घरों का बहुत कम सामान ही बचा पाए हैं। उन्हीं के आसरे वे अब अपना जीवन-यापन कर रहे हैं।
प्रशासन किस चिड़िया का नाम है
पिछले नौ दिनों से खुले आसमान के नीचे जी रहे चंद्रापुरी के निवासी सरकार और प्रशासन से बुरी तरह से नाराज हैं। जैसे ही हमने पूछा, क्या प्रशासन या सरकार की तरफ सेकोई मदद, तो पीड़ित गुस्से से एक साथ बोले-भाई साहिब, प्रशासन किस चीड़िया का नाम है। हमने तो पिछले नौ दिनों से उसके बारे में कुछ सुना नहीं है। कहीं दिख जाए तो आप हमें भी बता देना। हम भी उसकी खबर लेना चाहते हैं। इतना कहते हुए लोग, तरह-तरह से सरकार और प्रशासन को कोसने लगे। उनका गुस्सा देखते बन रहा था। पता नहीं, सरकार और प्रशासन को इसकी ख़बर कब पहुंचेगी?
जान जोखिम में डालकर पहुंचे चंद्रापुरी
कर्ण प्रयास से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित है, एन.एच-91 पर बसा है यह गांव। यही से होकर यात्री बद्रीनाथ जाते हैं। 16 जून की रात उन पर कहर बना बकर टूटी, जो उनका सब कुछ अपने साथ बहा कर ले गयी। चंद्रापुरी तक पहुंचने के लिए हमने सुबह करीब 8 बजे यात्रा कर्णप्रयास से शुरू की। रास्ते में जगह-जगह लैंड-स्लाइडिंग होने से, खुद ही रास्तों को साफ करना पड़ा। बारिस ने कई जगह रास्ता रोकने का प्रयास किया। लेकिन हर बाधा को पार करते हुए करीब 2 बजे बांड वाड़ा पहुंचे। वहां जाकर पता चला कि चंद्रापुरी पहुंचने के लिए 8 किलोमीटर पहाड़ी रास्ते को पार करके जाना होगा। बिना पल भर भी देर किए एक स्थानीय मोहित को लेकर हमने पहाड़ी की चढ़ाई शुरू की, और करीब ढाई घंटे बाद हम गांव पहुंचे, जो अब नदी में तब्दील हो चुका है।
हम पर भी तो ध्यान दें
शांत स्वाभाव के लिए जाने, जाने वाले यहां के लोगों का गुस्सा सरकार और प्रशासन के खिलाफ साफ दिखाई दे रहा था। गांव के लोग कहते हैं, हम मानते हैं कि बहुत से यात्री फंसे हैं। उनको निकालना भी बहुत जरूरी है। हमें इस पर किसी तरह का कोई गम नहीं है, लेकिन हम केवल इतना कहते हैं कि हम पर भी तो कुछ ध्यान दे सरकार, प्रशासन। हम भी तो पिछले 9 दिनों से खुले आसान के नीचे जी रहे हैं। हमारे पास, जो था वह पूरी तरह से खत्म हो गया। फिर उदास, होकर कहते हैं-पता नहीं कब सरकार और प्रशासन जागेगी।
क्या-क्या दें राहत-सामग्री में
गांवों में पहुंचने के सारे रास्ते खत्म हो चुके हैं। लोग खुले आसमान के नीचे हैं। बरसात शुरू हो चुकी है। इसलिए अब पीड़ितों को सबसे पहले चाहिए सिर छिपाने के लिए टेंट, कंबल, दरी और तिरपाल। सब घर नदी में बह गए हैं इसलिए उनको चाहिए रोटी के लिए आटा, दाल, चावल, नमक, कैरोसिन तेल, सरसों का तेल और भोज्य पदार्थ।
आर.एस.एस. के सदस्य भी पहुंचे
गोपेश्वर से आर.एस.एस. के कार्यकर्ता भी राहत समाग्री के साथ पहले बांसवाड़ा और फिर गांव पहुंचे। डॉ. जसपाल खत्री के नेतृत्व में आए सदस्यों ने राहत और वचाव को गांव वालों को सौंपा।
बांसवाड़ा को बचा लो
चंद्रापुरी पहुंचने के लिए एक मात्र पुल जो बचा है वह भी 16 जून को आए तूफान में पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। 30 किलोमीटर के क्षेत्र में केवल यही एक पुल बचा है। लेकिन इसकी हालत अब गई, तब गई है। बांसवाड़ा में भी अभी तक प्रशासन का कोई अधिकारी या कर्मचारी नहीं पहुंचा है। मंदिकिनी किसी भी क्षण उस पुल के साथ ही बांसवाड़ा का नीचला हिस्सा अपने आगोश में ले सकती है। पिछले नौ दिनों से यहां बिजली नहीं है। अगर समय रहते, प्रशासन ने ध्यान न दिया, तो करोड़ों का पुल एक ही झटके में बह जाएगा और बांसवाड़ा के नीचले हिस्से में रहने वाले लोग, काल के गाल में समा जाएंगे।