बाबा की यात्रा के भरोसे सैकड़ों घरों के चूल्हे जलते थे। अब आपदा ने यह ‘भरोसा’ तोड़ डाला है। कई घरों में खाने के लाले पड़ गए हैं।
16 और 17 जून को बाबा केदारनाथ के परिसर सहित रामबाड़ा और गौरीकुंड में हुई प्राकृतिक आपदा ने गुप्तकाशी और कालीमठ घाटी के जहां सैकड़ों लोगों को अपनों से छीन लिया वहीं जिंदा लोगों की जीने की उम्मीदें भी छीन लीं।
केदारनाथ धाम पर निर्भर थी आजीविका
आजीविका के साधन तबाह हो गए हैं। आने वाले दिनों में कई लोगों को तो घर का चूल्हा जलाने के लिए कड़ी मशक्कत
करनी पड़ेगी। गुप्तकाशी और कालीमठ क्षेत्र के अधिकांश गांवों की आजीविका केदारनाथ धाम पर निर्भर थी। पंडिताई से लेकर दुकान और खच्चर के काम में यहां के सैकड़ों लोग वर्षों से जुटे हुए थे। लेकिन इस वर्ष आए सैलाब ने सब कुछ नेस्तनाबूद कर दिया।
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लोगों के सपने पलक झपकते ही खत्म हो गए। रुद्रपुर गांव के 150 लोग इस वर्ष पंडिताई और दुकानदारी के लिए केदारनाथ गए थे। लेकिन जलप्रलय ने गांव के 10 लोगों को लील लिया, 25 से अधिक गंभीर घायल हो गए।
जान तो बच गई, जीवन कैसे चलेगा
रुद्रपुर गांव के भगवती प्रसाद शुक्ला, शंभू प्रसाद शुक्ला कहते हैं कि जो एक माह में जमा पूंजी थी, वह भी बह गई।
बमुश्किल जान बची। लेकिन अब जीवन कैसे चलेगा, समझ से परे है। बणूस गांव के रूप सिंह पंवार का कहना है कि रामबाड़ा में चार लाख रुपये लोन लेकर दुकान ली थी, लेकिन सब खत्म हो गया।
इतना शुक्र है कि मैं और बेटा बच गए। हालत यह थी कि बदन पर कपड़े भी पूरे नहीं रह गए थे। रुद्रपुर गांव के इंद्र सिंह रावत कहते हैं कि केदारनाथ में कैंटीन थी। दस लोग उसमें काम कर रहे थे। ढाई लाख रुपये में कैंटीन और उसमें सामान जोड़ा था, लेकिन सैलाब में सब बह गए। बच तो गए हैं, लेकिन अब कर्ज का बोझ सिर पर है।
देवर के राय सिंह ने कहा तीन खच्चर इस बार केदारनाथ यात्रा पर लगे थे, मैं बमुश्किल जान बचा पाया। रास्ता न होने के कारण खच्चर वहीं छोड़ने पड़े। अब घर का चूल्हा कैसे जलेगा, कौन मदद करेगा कुछ समझ में नहीं आ रहा है। यह दर्द भरी दास्तां क्षेत्र के हर उस गांव की है, जिसका केदारनाथ से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संबंध था।
स्थानीय बाजार भी प्रभावित
केदारनाथ यात्रा का मुख्य केंद्र गुप्तकाशी बाजार पर भी त्रासदी का असर पड़ा है। यहां पर अधिक व्यवसायियों के व्यापार ठप हैं। महेश सेमवाल बताते हैं यहां अब सन्नाटा पसरा पड़ा है।
अन्य दुकानदारों का कहना है कि दिन का खर्चा निकालना मुश्किल हो गया है। अब हालात दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं। केदारबाबा की यात्रा थी तो चिंता न थी अब तो चिंता खाए जा रही है कि घर खर्च कैसे चलेगा।