हिमालयी राज्य के बजट में पहली बार जलवायु परिवर्तन का अक्स नजर आया है। ग्लोबल वार्मिंग के मद्देनजर सबसे अधिक महत्वपूर्ण इस राज्य में गठन के बाद अभी तक इस ओर सरकारों का ध्यान नहीं गया था।
वर्ष 2013 की भीषण आपदा से नसीहत लेते हुए बजट में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों का विस्तृत रोड मैप तैयार करने का प्रावधान किया गया है। रोड मैप होने पर आपदा से बचाव की रणनीति बनाने में आसानी रहेगी। इसके साथ ही इको सिस्टम की सुरक्षा के लिए भी बजट में प्रावधान किए गए हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों का रोड मैप न होने का खामियाजा केदारनाथ आपदा में लोगों ने भुगता था। शासन-प्रशासन को कुछ पता ही नहीं था कि बचाव का रास्ता किधर से निकाला जाए।
आपदा प्रबंधन का बचाव कार्य तुक्के पर चला:
पुलिस, सेना, प्रशासन, आपदा प्रबंधन, वन, कृषि, सिंचाई के विभागीय सेंटरों में कनेक्टीविटी ही नहीं थी। पूरा का पूरा आपदा प्रबंधन का बचाव कार्य तुक्के पर चला था।
ऐसी स्थिति दुबारा न हो, इसके लिए बजट में उपग्रहों के आंकड़ों से ग्लेशियर, बर्फ की वास्तविक स्थिति, जलवायु परिवर्तन का असर और अलकनंदा, भागीरथी, यमुना नदियों के बेसिन के अध्ययन का प्रावधान किया गया है।
रोड मैप तैयार करने की एजेंसी यूसैक को नामित किया गया है। विभाग अपने प्रस्ताव विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग को देंगे। आईटी, पर्यटन के साथ सूचना प्रौद्योगिकी के लिए 247.25 करोड़ रुपये की व्यवस्था कर दी गई है।
प्रदेश की जैव विविधता और इको सिस्टम बचाने के लिए बजट में व्यवस्था की गई है। सेंटर फॉर एक्सीलेंस फॉर माउंटेन बायो टेक्नोलॉजी में कीवी, ब्राह्मी, आर्किड, केसर, केला पर कार्य किया जाएगा। इसके साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संवर्द्धन में तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।