उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक डॉ. मणिंद्र मोहन ने बताया कि वैश्विक स्तर पर ग्लेशियर निगरानी सेवा तथ्य उपलब्ध कराती है। आंकड़ों के अनुसार पर्यावरण में हो रहे परिवर्तनों के कारण भविष्य के संरक्षक कहे जाने वाले ग्लेशियर खतरनाक दर से सिकुड़ रहे हैं। इसे देखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2025 को ग्लेशियरों के संरक्षण का अंतरराष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। इसके साथ ही 21 मार्च को प्रतिवर्ष विश्व ग्लेशियर दिवस मनाने का फैसला लिया है। बताया कि ग्लेशियर गर्म होती पृथ्वी के कारण पिघल कर संकुचित हो रहे हैं।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून के वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि ग्लेशियरों का पिघलना प्राकृतिक घटना है। जिस गति से उत्तराखंड में ग्लेशियर पिघल रहे हैं वह चिंताजनक है। बताया गया कि हिमालयी क्षेत्र में 9575 ग्लेशियर हैं। 900 ग्लेशियर उत्तराखंड में हैं। ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन और ब्लैक कार्बन के कारण उत्तराखंड के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के कुछ महत्वपूर्ण ग्लेशियर गंगोत्री, सतोपंथ, भागीरथी और रायखाना हैं। इन पर बढ़ते वैश्विक तापमान का प्रभाव पड़ रहा है। एक माह पूर्व एक अन्य प्रकाशित अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश में पिछले 32 सालों में 110 ग्लेशियरों के विलुप्त होने की पुष्टि की गई है। संवाद
कल है जल दिवस, थीम भी ग्लेशियर संरक्षण
डॉ. मणिंद्र ने बताया कि कल (22 मार्च) को विश्व जल दिवस है, जिसकी थीम भी ग्लेशियर संरक्षण रखी गई है। इसका एकमात्र उद्देश्य दुनिया भर के ग्लेशियरों की रक्षा के लिए तत्काल आवश्यकताओं पर जोर देना और बढ़ते वैश्विक तापमान को कम करने के प्रति जागरूक करना है। ग्लेशियर पृथ्वी पर जल-चक्र एवं जल सुरक्षा को बनाए रखने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। पिघलते ग्लेशियरों पर दुनिया का ध्यान केंद्रित हुआ और इनके संरक्षण के प्रयास शुरू हो गए हैं।
पृथ्वी पर 70 फीसदी जल ग्लेशियर के रूप में मौजूद
डाॅ. मणिंद्र ने बताया कि यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी का लगभग 70 फीसदी जल बर्फ या ग्लेशियर के रूप में मौजूद है। करीब दो अरब लोग पेयजल, कृषि और ऊर्जा उत्पादन के लिए ग्लेशियरों, बर्फ और पहाड़ों से निकलने वाले पानी पर निर्भर हैं। ग्लेशियर पृथ्वी पर जीवन के महत्वपूर्ण संसाधन हैं और जल स्रोतों के साथ पृथ्वी पर नदियों को जीवंत रखते हैं। साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने, लाखों लोगों के जीवनयापन में मदद करने और जैव विविधता संरक्षण में ग्लेशियर महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
संरक्षण का क्या है उपाय
डाॅ. मणिंद्र ने बताया कि जमे हुए ग्लेशियर अब बढ़ते तापमान की जद में हैं और खतरनाक दर से पिघल कर संकुचित हो रहे हैं। जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ने के साथ वातावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने का एकमात्र कारण पृथ्वी पर बढ़ती गर्मी है।
-वातावरण की गर्मी को कम करके
-अप्रत्याशित पेड़ों के कटान पर रोक
-जल विद्युत परियोजनाओं, पहाड़ों में तोड़फोड़ और विस्फोट पर नियंत्रण
-जंगलों में अत्यधिक पर्यटन तथा वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण
- जंगलों की आग पर नियंत्रण