फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Exclusive: जिस पिरूल से जंगल जलने को मजबूर...वही घरों को करेगा मजबूत, पत्तियों से बनाया बोर्ड; जानें खासियत

Fri, 14 Feb 2025 01:09 PM IST
हीरा मेहरा आदर्श सिंह, अमर उजाला

सार

जंगलों में गर्मियों के दिनों में लगने वाली आग में चीड़ की सूखी पत्तियां बारूद का काम करती हैं। टिहरी के बौराड़ी में रहने वाली जैनब सिद्दीकी ने पिरूल का बेहतर विकल्प खोज निकाला है। जैनब ने पिरूल से वुडन बोर्ड तैयार करने का तरीका खोजा है।
विज्ञापन
पिरूल - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

 

उत्तराखंड की सुंदरता उसके जंगल और पहाड़ हैं। प्रदेश के सभी लोग इन्हें सुरक्षित रखने की कल्पना करते हैं, लेकिन एक महिला ने कल्पना को हकीकत में बदलकर जंगलों में लगने वाली आग के मुख्य कारण का समाधान खोज निकाला है। इस समाधान से न सिर्फ जंगलों की आग बल्कि पेड़ों की कटाई पर भी काबू पाया जा सकेगा।

दरअसल, जंगलों में गर्मियों के दिनों में लगने वाली आग में चीड़ की सूखी पत्तियां बारूद का काम करती हैं। ऐसे में इन पत्तियों का सही विकल्प जैनब ने ढूंढ निकाला है। उन्होंने इसके लिए पेटेंट भी फाइल कर रखा है। ये पत्तियां नॉन-बॉयोडिग्रेडेबल के साथ ही ज्वलनशील होती हैं। इनकी वजह से आग तेजी से फैलती है। आग पर काबू पाने के लिए सरकार भी कई योजना चला चुकी है। इसके बावजूद हर साल जंगल धधकते हैं।

अब टिहरी के बौराड़ी में रहने वाली जैनब सिद्दीकी ने पिरूल का बेहतर विकल्प खोज निकाला है, जिससे आग लगने की संभावना कम होगी और पिरूल के इस्तेमाल से पेड़ों की कटाई पर भी असर पड़ेगा। दरअसल, जैनब ने पिरूल से वुडन बोर्ड तैयार करने का तरीका खोजा है। इन पत्तियों से मजबूत नॉन वुड रेजिड्यू फाइबर बोर्ड बनाए जाएंगे। जोकि मार्केट में उपलब्ध अन्य बोर्ड के मुकाबले अधिक मजबूत होंगे। इससे पत्तियों का सही उपयोग होगा और जंगलों में आग लगने की समस्या भी काफी हद तक कम होगी। जैनब ने बताया कि वह चीड़ के पत्तों के उपाय पर सात-आठ साल से रिसर्च कर रही थीं। कई प्रयासों के बाद वुडन बोर्ड का प्रयोग सही साबित हुआ।

 

पति व ससुरालियों की मदद से मिली ताकत

विज्ञापन

जैनब सिद्दीकी यूपी के शामली जिले के कैराना शहर की रहने वाली हैं। उत्तराखंड के टिहरी जिले के बौराड़ी शहर के शारिक अहमद से उनका निकाह हुआ है। यहां उन्होंने अपने पति से जंगलों में आग लगने की सबसे बड़ी समस्या सुनी। जैनब बताती हैं कि उन्हें पर्यावरण से बेहद प्रेम है। जब उन्हें धधकते जंगल की दास्तां पता चली, तो उन्होंने इसे संरक्षित करने के बारे में सोचा। इसके बाद उन्होंने मास्टर ऑफ साइंस इन बॉटनी में एडमिशन लिया। इसके बाद पिरूल के कई उपाय सोचे। ऐसे में बोर्ड बनाने का एक्सपेरिमेंट सफल रहा। इसके बाद उन्होंने इको कार्व प्राइवेट लिमिटेड नाम से अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। वह कहती हैं पति और ससुराल वालों के सहयोग से यह मुमकिन हो पाया। जैनब का एक पांच साल का बेटा भी है।

 

 

ऐसे तैयार होते हैं बोर्ड
चीड़ की पत्तियों और एग्रीकल्चर रेजिड्यू को एक साथ पीस कर इसमें प्राकृतिक रेजिन मिलाए जाते हैं। इसके बाद मशीन में इसे एक साथ तापमान और तय दबाव से गर्म और कंप्रेस किया जाता है। इस प्रकार इसमें मजबूती आती है। मार्केट में उपलब्ध पार्टिकल बोर्ड के मुकाबले इसकी मजबूती बेहतर है। साथ ही यह वाटर रेजिस्टेंस और फायर रेजिस्टेंस भी है। इन बोर्ड में स्क्रू होल्डिंग क्षमता भी है, जोकि मार्केट में उपलब्ध अन्य बोर्ड में नहीं होती है। इनसे डोर पैनल, विंडो, कैबिनेट, बुक सेल्फ, मॉड्यूलर किचन, डोर, फर्नीचर इत्यादि बनाए जा सकते हैं। जैनब ने बताया कि इसका इस्तेमाल वॉल पैनल और फ्लोर टाइल्स में भी किया जाएगा। इन बोर्ड पर लेजर प्रिटिंग, लेजर कटिंग भी हो सकती है। एक बोर्ड की कीमत करीब 30-35 रुपये प्रति स्क्वेयर फुट रहेगी। मार्केट में एमडीएफ और पार्टिकल बोर्ड भी इन्हीं कीमतों के आसपास उपलब्ध हैं।

किसानों से खरीदेंगी पराली व भूंसी

विज्ञापन

जैनब ने बताया कि किसान फसल कटने के बाद चावल की भूंसी व पराली में आग लगा देते हैं। इससे पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है। इसे किसानों से खरीदकर वुडन बोर्ड बनाने में इस्तेमाल किया जाएगा। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं चीड़ की पत्तियों और किसानों से एग्रीकल्चर वेस्ट को उपलब्ध कराएंगी। उनसे प्रति किलो के हिसाब से इसे खरीदेंगे। इससे उन्हें रोजगार भी मिलेगा। अभी हमारा स्टार्टअप स्कैलिंग स्टेज पर हैं। इंडस्ट्री के साथ मिलकर जल्द ही प्रोडक्शन शुरू करेंगे। ताकि पायलट प्रोजेक्ट के तहत स्टैंडर्ड साइज के बोर्ड तैयार किए जा सकें।

 

आईआईएम के सहयोग से मिला पांच लाख का सहयोग
आईआईएम काशीपुर के सहयोग से इस स्टार्टअप को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय से पांच लाख रुपये की फंडिंग मिली है। साथ ही उन्हें देवभूमि उद्यमिता योजना (डीयूवाई) से 75 हजार की सहयोग राशि मिली है। इन रुपयों से जैनब पायलट प्रोजेक्ट शुरू करेंगी। अपनी इस रिसर्च के लिए वह पेटेंट फाइल कर चुकी हैं। एक साल के भीतर पेटेंट मिल जाएगा। वुडन एमडीएफ बोर्ड की डिमांड बहुत है। इसके लिए पेड़ काटे जा रहे हैं। जैव विविधता को बरकरार रखने में हमारा स्टार्टअप काफी सहयोगी साबित होगा। इसी के चलते हम दूसरे पेड़ों के पत्तों पर भी ट्रायल कर रहे हैं।

 

 

 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें