कुलपति डाॅ. मनमोहन सिंह चौहान।
पंतनगर। जीबी पंत कृषि विवि ने जीवाणुरोधी प्लास्टिक बनाने की तकनीक को बीते 10 लाख रुपये में बायोटेक कंसोर्शियम इंडिया लिमिटेड दिल्ली को हस्तांतरित कर दी है। इसका शनिवार को कुलपति सभागार में दोनों पक्षों के बीच एमओयू साइन किया गया। विवि के वैज्ञानिकों डाॅ. एमजीएच जैदी और डाॅ. रीता गोयल ने वर्ष 2020 में 11 वर्षाें के परिश्रम से जीवाणुरोधी प्लास्टिक बनाने की सफलता हासिल की थी। इस हस्तांतरण के बाद अब फूड प्रोसेसिंग और पैकेजिंग सहित सर्जिकल सिरिंज आदि में प्रयुक्त होने वाले प्लास्टिक उपकरणों को बार-बार स्टरलाइजिंग के झंझट से छुटकारा मिल जाएगा।
डाॅ. जैदी ने बताया कि एक ही बैक्टीरिया के बहुत सारे स्टेन पाए जाते हैं। इसलिए उन लोगों ने वर्ष 2020 में इस एंटी बैक्टीरियल प्लास्टिक को विकसित किया था। इसका उपयोग लैब में, जहां पर वायरस, बैक्टीरिया अथवा फंगस का कल्चर होता है, किया जा सकेगा। बताया कि सामान्यतः बैक्टीरिया और फंगस के लैब एक साथ नहीं हो सकते, इसलिए इनके अलग-अलग लैब बनाए जाते हैं क्योंकि लैब में जब हम किसी भी बैक्टीरिया का कल्चर करते हैं तो उसके साथ में दूसरे पाइथोजन (जैसे फंगस) भी ग्रो हो जाते हैं। उससे माइक्रो बायोलाॅजिस्ट कन्फ्यूज हो जाते हैं।
एंटी बैक्टीरियल प्लास्टिक के यह हैं उपयोग
डाॅ. जैदी ने बताया कि विकसित एंटी बैक्टीरियल प्लास्टिक वहां पर उपयोग में आएगा जहां पर बैक्टीरिया और फंगस एक साथ ग्रो हो रहे हैं। वहां पर यह बैक्टीरिया को मार देगा और फंगस को ग्रो होने में मदद करेगा। आप चाहें बैक्टीरिया ग्रो करें या फंगस को, यह प्लास्टिक बैक्टीरिया को ग्रो नहीं होने देगा। दूसरा इसका घरेलू उत्पादों में उपयोग किया जा सकता है। जैसे टिफिन बाॅक्स, कंटेनर, कोटिंग व फूड पैकेजिंग आदि में। इनमें फूड बैक्टीरिया से बहुत अधिक प्रभावित होता है। क्योंकि बैक्टीरिया फूड को कार्बन सोर्स की तरह प्रयोग करता है। इसके अलावा मोबाइल के कवर, जूते के सोल व माइक्रो बायोलाॅजी आदि में भी इसका उपयोग किया जा सकता है।
जीवाणुरोधी प्लास्टिक तैयार करने वाले वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई है। इस प्लास्टिक के निर्माण में जो भी पदार्थ और नैनो पार्टिकल्स प्रयोग किए गए हैं वे मानव हितैषी हैं। - डाॅ. मनमोहन सिंह चौहान, कुलपति-पंतनगर विवि