औद्योगिक नगरी में पटरी से उतरी यातायात व्यवस्था को ठीक करने के मकसद से गठित सीपीयू कागजों में उलझकर रह गई है। 8 महीने बाद भी आधुनिक उपकरणों से लैस 8 बाइकें सड़कों में दौड़ने के बजाय पुलिस लाइन के कमरे में धूल फांक रही है। दिलचस्प बात है कि अभी तक सीपीयू के लिए पुलिसकर्मियों का चयन तक नहीं हो सका है। पुलिस अफसर भी पीएचक्यू से निर्देश मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
सिडकुल बढ़ने के साथ ही शहर में वाहनों का दबाव भी चौगुना हो चुका है। यातायात व्यवस्था बेकाबू होने से सड़क हादसों में भी इजाफा हो रहा है। चेकिंग अभियान से लोगों में हेलमेट पहनने की आदत डाली जा रही है। इसके अलावा ट्रैफिक लाइटों को दुरुस्त कर यातायात नियमों का पालन भी करवाया जा रहा है। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद यातायात व्यवस्था पटरी पर नहीं आ सकी है। वर्ष 2014 में सीपीयू का गठन कर पहले चरण में देहरादून और हरिद्वार में उतारा गया था।
बेहतर परिणाम मिलने के बाद सीपीयू को हल्द्वानी में भी तैनात किया गया था। रुद्रपुर में सीपीयू की जरुरत महसूस हुई तो इसी साल 14 मई को रजिस्ट्रेशन के साथ ही आठ अत्याधुनिक बाइकें पुलिस लाइन पहुंच गई थीं। बाइकें आने के बाद जिले से सीपीयू के लिए पुलिसकर्मियों की सूची भेजी गई थी। सूत्रों के मुताबिक पहली सूची खारिज होने के बाद मुख्यालय को दूसरी सूची भेज दी गई थी। लेकिन अभी तक सूची फाइनल नहीं की जा सकी है।
सूची को हरी झंडी मिलने के बाद प्रशिक्षण होना है। तेजी में तो सीपीयू बाइकें मंगवा ली गई, लेकिन अफसरों की उदासीनता से सीपीयू का जल्द सड़कों में दिखना संभव नहीं लग रहा है। एसएसपी केवल खुराना कहते हैं कि सीपीयू का संचालन दूसरे शहरों में पीएचक्यू के निर्देश पर हो रहा है। इस संबंध में पीएचक्यू से कोई निर्देश प्राप्त नहीं हो पाए हैं।