रुद्रपुर। ‘मुझे तेरी मुहब्बत ने ही बस जीना सिखाया है, जाम उल्फत का हौले-हौले से पीना सिखाया है
मैंने तो जिंदगी में आस रखना छोड़ डाला था, तेरी बातों ने ही मुझको ख्वाब सीना सिखाया है...।’
वेलेंटाइन वीक में यह कविता दाएं पैर से दिव्यांग मुकेश और नेत्रहीन सीमा के दांपत्य जीवन पर बिल्कुल सटीक बैठती है। दोनों का एक-दूसरे के प्रति समर्पण उन युवाओं के लिए सीख है, जिनका प्यार सिर्फ वेलेंटाइन वीक के दौरान परवान चढ़ता है और इसके बीतने के साथ ही दम तोड़ देता है।
फुलसुंगा गांव में सड़क किनारे झोपड़ी में मुकेश (31) अपनी पत्नी सीमा (25) के साथ रहते हैं। मूल रूप से रिछौला नवाबगंज (बरेली) निवासी मुकेश आठवीं पास होने के साथ ही एक पैर से दिव्यांग हैं। जिंदगी के 25 वसंत देखने के बाद वर्ष 2013 में मुकेश की शादी मछुआखेड़ा पीलीभीत निवासी सीमा से हुई।
सीमा नेत्रहीन हैं, 2008 से मुकेश हेयर ड्रेसर का काम कर रहे हैं। दिव्यांग मुकेश पर रोजी-रोटी कमाने के साथ पत्नी को संभालने की भी जिम्मेदारी है। नेत्रहीन होने के कारण सीमा कोई काम नहीं कर पातीं लेकिन इन दुश्वारियों के बीच भी मुकेश का सीमा के प्रति प्यार कम नहीं हुआ है। मुकेश कहते हैं एक-दूसरे के प्यार और समर्पण से दांपत्य जीवन के छह वसंत कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।
दोनों का यही प्रेम प्रेरणा देता है कि कैसा भी समय हो लेकिन हमसफर साथ हो तो हर मुश्किल का हल निकल ही आता है। मुकेश अपनी हेयर ड्रेसर की दुकान संभालने के साथ ही घर में खाना बनाने से लेकर अन्य सारे काम भी वही करते हैं। हां... यह बात और है कि सीमा नेत्रहीन होने के बावजूद घर के हर काम में जितना हो सकता है मुकेश की मदद करती हैं।
दोनों से जब बात की गई तो उन्होंने बताया कि जिंदगी में मिलने वाली छोटी-छोटी खुशियां ही उनके सफल दांपत्य जीवन का राज है। हम एक-दूसरे के सुख-दुख के साथ हैं और हर दिक्कत का मिलकर सामना करते हैं। मुकेश के पिता वीरेंद्र, बड़े भाई कृष्णा और दुर्गेश पैतृक गांव में रहते हैं। दोनों की शादी के बाद परिजनों ने उनसे किनारा कर लिया। इधर, सीमा कहती है कि मुकेश ने उनकी अंधियारी जिंदगी को रोशन किया है। भले ही उनकी माली हालत अच्छी नहीं है लेकिन जिंदगी में खुशियां बेशुमार हैं।
पात्र होने के बावजूद नहीं बना अंत्योदय कार्ड
रुद्रपुर। दिव्यांग मुकेश कुमार बताते हैं कि अंत्योदय राशन कार्ड के लिए वह डीएसओ कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं। अब जाकर डीएसओ ने उनका अंत्योदय कार्ड बनाने का आश्वासन दिया है। मुकेश बताते हैं कि सरकार पीएम आवास योजना चला रही है लेकिन उन्हें नहीं पता कि इसके लिए कैसे आवेदन करना है। वह कहते हैं कि अभी तक किसी भी जनप्रतिनिधि या अधिकारी ने भी पीएम आवास के लिए उनकी सुध नहीं ली। अगर घर मिल जाता तो उनकी छोटी सी दुनिया में और खुशियां आ जातीं...।