काशीपुर। मोहल्ला बांसफोड़ान में एक ऐसी गली है जिसका नाम सुनकर ही मुंह में मिठास घुल जाती है। विडंबना है कि बूरा-बताशा वाली गली के नाम से पहचाने जाने वाली इस गली में पिछले डेढ़ दशक से यह कारोबार पूरी तरह से चौपट हो गया है। यहां न बूरा बनता है, न बताशा। गली के गिने चुने दुकानदार मुरादाबाद के पाकवाड़ा से माल मंगा कर बेचते हैं।
करीब डेढ़ दशक पहले तक बुरा बताशा गली गुलजार रहती थी। यहां रात-दिन भट्टियां धधकती थीं। कारीगर शक्कर की चाशनी कढ़ाई में पकाकर बूरा, बताशे और मीठे खिलौने बनाते थे। कारीगर फुर्ती से लकड़ी के फर्मे में चाशनी डालते और चाशनी के ठंडा होते ही फर्मे से बताशे निकल आते। खासकर दीपावली में बुरे से बनने वाले मीठे खिलौने बताशे और खीलों की खूब बिक्री होती थी।
कोट-
बूरे बताशे का कारोबार करने वाले बताते हैं कि काशीपुर की मिश्री-बताशे की मांग सिर्फ तराई के शहरों में ही नहीं बल्कि रामनगर मंडी से होकर रानीखेत, अल्मोड़ा, बागेश्वर, देघाट, बीरोंखाल, गैरसैंण तक थी। - मो. वासिल, कारोबारी
यहां बनी मिश्री की मांग दूरदराज के जिलों तक थी। वक्त बदला, कारीगर बूढ़े हो गए। मिठाई का ट्रेंड बदला तो नई पीढ़ी ने इस धंधे को अपनाया ही नहीं। अब पूरे बाजार में सिर्फ दो दुकानें बची हैं। वो भी अपना माल खुद नहीं बनातीं। सारा माल पाकवाड़ा, मुरादाबाद से मंगाया जाता है। -जावेद, कारोबारी