परिवार पर कोई मुसीबत आए तो बेटियां सबसे पहले जिम्मेदारी उठाने को तैयार रहती हैं। पुलिस की जांबाज सिपाही शबिया खातून मुस्लिम समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। लड़कों को ही घर का चिराग समझने वाले समाज को वे सच्चाई का आइना दिखा रही हैं। पिता की मौत के बाद शबिया के कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। शबिया अपने सातों बहन-भाइयों को बेहतर शिक्षा दिला रही हैं। अपने भाई-बहनों के कैरियर को संवारने के लिए उन्होंने अब तक निकाह भी नहीं किया।
सितारगंज से करीब छह किमी दूर नकहा गांव की रहने वाली शबिया खातून बेहद गरीब परिवार से हैं। उसके पिता छोटे बख्श मजदूर थे। शबिया ने घर के पास ही स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय से कक्षा पांच तक की शिक्षा ग्रहण की। सिसैया के जूनियर हाईस्कूल से आठवीं के बाद सितारगंज राजकीय बालिका इंटर कालेज से हाईस्कूल किया और फिर बरा के जीजीआईसी से 12वीं की शिक्षा ली। इसके बाद 16 दिसंबर 2007 को शबिया खातून पुलिस में भर्ती हुई और कांस्टेबल के पद पर रहकर खटीमा डिग्री कालेज से बीएससी एवं बीएसएम डिग्री कालेज रुड़की से राजनीति शास्त्र विषय से एमए की प्राइवेट डिग्री ली। शबिया की पहली पोस्टिंग हरिद्वार की लक्सर कोतवाली में हुई।
दो साल बाद सिविल लाइन कोतवाली रुड़की में एक साल तैनात रही। 2012 से शबिया रुड़की के महिला हेल्पलाइन में तैनात हैं। शबिया के पुलिस में भर्ती होने के बाद 19 नवंबर 2009 को पिता छोटे की मौत हो गई। जिसके बाद से परिवार की जिम्मेदारी शबिया संभाल रही हैं। शबिया ने बताया कि उसकी बहन रूबी ने खटीमा से बीए, रुकइया ने एमए की डिग्री ली है और उससे छोटी रजिया सिसैया के डीएस पब्लिक स्कूल में इंटर की छात्रा है। सभी बहनों से छोटा भाई फिरोज अहमद वर्ष 2012 में पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हुआ था और वर्तमान में नैनीताल में उसकी तैनाती है।
शबिया की गृहणी मां अनीसा ने बताया कि उनका सपना था कि उनकी बेटियां नाम रोशन करें। जिसे शबिया ने पूरा कर दिखाया है। कहा कि शबिया से छोटी दो बहनें भी सरकारी नौकरी में भर्ती होने के लिए तैयारी कर रही हैं। बेटियों को गरीबी से दोचार होते हुए पढ़ाया और इस दौरान लोगों के ताने भी सुने। पर, आज बेटी को वर्दी में देख सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है।