रुद्रपुर। तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश चंद्र की अदालत ने कार और बाइक की टक्कर के बाद हुए विवाद में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोप तय कराने की मांग खारिज कर दी। अदालत ने वादी की दांडिक पुनरीक्षण याचिका निरस्त करते हुए निचली अदालत के आदेश को विधिसम्मत माना।
मामला 8 मार्च 2023 को होली के दिन रुद्रपुर की इंदिरा कॉलोनी में कार और बाइक की टक्कर के बाद हुए विवाद से संबंधित है। वादी देवेंद्र कुमार का आरोप था कि दुर्घटना का विरोध करने पर आरोपी पारस गाबा और उसके भाई ने उनके साथ मारपीट की। साथ ही अवैध पिस्टल लहराई और बाद में अन्य लोगों के साथ उनके घर पहुंचकर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए अपमानित किया।
अदालत ने पाया कि विवेचना के दौरान दर्ज स्वतंत्र गवाहों के बयानों में जातिसूचक शब्दों के प्रयोग की पुष्टि नहीं हुई। ऐसे आरोप केवल वादी और उसके परिजनों ने लगाए हैं। उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के बीच विवाद का कारण वाहन की टक्कर था न कि वादी की जाति।
निचली अदालत का फैसला बरकरार
तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले काे बरकरार रखा। निचली अदालत ने मामले में एससी/एसटी अधिनियम के तहत आरोप तय करने से इनकार कर दिया था जिसके खिलाफ वादी ने पुनरीक्षण याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने केस डायरी, विवेचना और गवाहों के बयानों का परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधान तभी लागू होते हैं जब किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर सार्वजनिक रूप से जानबूझकर अपमानित किया गया हो।
कोर्ट ने क्या कहा....
अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक अपमान या धमकी स्वतः एससी/एसटी अधिनियम के दायरे में नहीं आती। इसके लिए यह सिद्ध होना आवश्यक है कि पीड़ित को उसकी जाति के कारण सार्वजनिक रूप से निशाना बनाया गया हो। इसलिए उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस मामले में एससी/एसटी अधिनियम के तहत आरोप तय करने का कोई आधार नहीं बनता।