रुद्रपुर। उत्तराखंड का प्रमुख औद्योगिक केंद्र सिडकुल देश के सबसे बड़े रोजगार हब में शुमार है लेकिन यहां काम कर रहे करीब तीन लाख से अधिक श्रमिक और कर्मचारी गंभीर यातायात संकट से जूझ रहे हैं। पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से आए हजारों श्रमिकों के लिए सीधी ट्रेन की सुविधा नहीं है। नतीजा यह है कि घर जाना अब समय, धन और मानसिक तनाव की बड़ी परीक्षा बन गया है।
सरकारी और औद्योगिक आंकड़ों के अनुसार सिडकुल क्षेत्र में करीब 1200 से अधिक छोटी-बड़ी फैक्टरियां संचालित हैं जिनमें स्थायी और संविदा मिलाकर तीन लाख से ज्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों छपरा, दरभंगा, सीवान, गोरखपुर, आजमगढ़ और बलिया बिहार से आता है।
विडंबना यह है कि इतनी बड़ी श्रमिक आबादी के बावजूद रुद्रपुर या पंतनगर से बिहार-पूर्वांचल के लिए कोई सीधी ट्रेन की सुविधा नहीं है। कुछ साल पहले पंतनगर एयरपोर्ट से सीमित फ्लाइट सेवाएं उपलब्ध थीं लेकिन अब वे भी बंद हो चुकी हैं।
वर्तमान में सिर्फ दिल्ली के लिए ही फ्लाइट संचालित हो रही हैं। मजदूरों को मजबूरी में दिल्ली, लखनऊ या काठगोदाम तक का लंबा सफर तय करना पड़ता है। इसके बाद दूसरी ट्रेन पकड़नी पड़ती है जिससे यात्रा 24 से 36 घंटे तक खिंच जाती है।
श्रमिकों की पीड़ा : छुट्टी से ज्यादा सफर थका देता है
सिडकुल की एक फैक्टरी में काम करने वाले बिहार निवासी रमेश कुमार कहते हैं कि छुट्टी चार दिन की मिलती है लेकिन दो दिन तो आने-जाने में ही निकल जाते हैं। सीधे ट्रेन होती तो परिवार के साथ वक्त बिता पाते। वहीं गोरखपुर के रहने वाले सलीम अंसारी बताते हैं कि किराया बढ़ गया है, समय ज्यादा लगता है और ट्रेन बदलते-बदलते हालत खराब हो जाती है।
औद्योगिक विकास, लेकिन श्रमिक उपेक्षित
सिडकुल की एक कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी बीपी सिंह का कहना है की सिडकुल को जिस गति से विकसित किया गया उसी अनुपात में यातायात और रेल कनेक्टिविटी पर ध्यान नहीं दिया गया। इससे पहले कई बार रुद्रपुर और पंतनगर से पूर्वांचल-बिहार के लिए साप्ताहिक या विशेष ट्रेन चलाने की मांग की जा चुकी है। सिडकुल एसोसिएशन के अध्यक्ष सीके सिन्हा का कहना है की इन दिनों न ट्रेन की सीधी सुविधा है न ही फ्लाइट की। ऐसे में यहां के श्रमिकों को आने जाने के लिए तमाम कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
एक नजर में
सिडकुल में कुल कर्मी लगभग 3,00,000
पूर्वांचल–बिहार से आने वाले कर्मी लगभग 10 फीसदी
प्रभावित कर्मियों की संख्या 30,000
प्रमुख जिले बनारस, बलिया, छपरा, बिहार के कई जिले
वर्तमान स्थिति न सीधी ट्रेन, न फ्लाइट सेवा
सबसे अधिक परेशानी त्योहार, आपात स्थिति
इस रुट के जरिए चलाई जा सकती है ट्रेन
हल्द्वानी, लालकुआं, रुद्रपुर, बरेली, लखनऊ, अयोध्या, शाहगंज, जौनपुर, वाराणसी, औंड़िहार, गाजीपुर सिटी, बलिया होते हुए छपरा तक जा सकती है। इस रेल मार्ग पर ट्रेन चलाने से पूरे कुमाऊं के लोगों को भी राममंदिर के अलावा वाराणसी में बाबा विश्वनाथ मंदिर का दर्शन करने में आसानी होगी। साथ ही पूर्वांचल के लोगों को भी कुमाऊं से जोड़ने में आसानी होगी।
क्रांति से शांति की भूमि को जोड़ने के लिए ट्रेन चाहिए
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल जिला का बलिया क्रांति की भूमि है। बड़ी संख्या में यहां के लोग किच्छा, रुद्रपुर में बसे हुए है। इसके अलावा पूर्वांचल के कई जिलों के लोग शांति की तलाश में बाबा नीब करौरी के दर्शन के लिए भी आ रहे हैं। इसी तरह कुमाऊं के लोग अयोध्या में श्री राममंदिर और वाराणसी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन पूजन के लिए बड़ी संख्या में जा रहे हैं लेकिन अभी तक इस मार्ग पर कोई ट्रेन की सुविधा नहीं है। यदि जल्द ही इस रूट पर ट्रेन का संचालन शुरू होगा तो लोगों को काफी आसानी होगी।