रुद्रपुर। जिले की आपातकालीन एंबुलेंस व्यवस्था आंकड़ों में भले मजबूत है, लेकिन जमीन पर तस्वीर उलट है। 108 सेवा की 25 एंबुलेंस में सिर्फ तीन एडवांस लाइफ सपोर्ट (एएलएस) हैं, बाकी बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) के सहारे आपात संभालने का दावा करती हैं। मातृ-शिशु परिवहन योजना खुशियों की सवारी की 21 गाड़ियां अलग चल रही हैं, पर उनका दायरा सीमित है। सवाल यह है कि गंभीर हादसों और कार्डियक मामलों में जिले के पास वास्तव में कितनी उन्नत तैयारी है।
जिला अस्पताल में तीन एंबुलेंस तैनात है, एक एएलएस और दो बीएलएस। यही सीमित संसाधन पूरे शहर की आपात जरूरतों का भार उठाते हैं। अप्रैल से नवंबर के बीच 13,980 मरीज एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचे, जिनमें 4,663 गर्भावस्था, 1,482 सड़क दुर्घटना, 698 श्वसन, 254 हृदय और 578 तीव्र पेट दर्द के मामले शामिल हैं। आंकड़े मांग की गंभीरता बताते हैं, मगर उन्नत सुविधाओं की कमी व्यवस्था की पोल खोलती दिखती है।
वेंटिलेटर और डिफिब्रिलेटर जैसे जरूरी उपकरण जर्जर
जमीनी हकीकत उपकरणों की हालत से और स्पष्ट होती है। कई एंबुलेंसों में मॉनिटर, वेंटिलेटर और डिफिब्रिलेटर जैसे जरूरी उपकरण जर्जर हैं। कहीं एसी खराब, तो कहीं ऑक्सीजन सिलेंडर और फ्लो-मीटर तक गायब। प्राथमिक उपचार बॉक्स में दवाएं और पट्टियां नहीं मिलना आम शिकायत है। वहीं गंभीर ट्रॉमा और हृदय रोगियों को रेफर करना मजबूरी बनती है और परिजन निजी एंबुलेंस या निजी वाहन का जोखिम उठाने को विवश होते हैं। जब तक कागज़ी दावों से आगे बढ़कर एंबुलेंसों में वास्तविक आईसीयू जैसी सुविधाएं नहीं दिखेंगी, तब तक जिले की आपात व्यवस्था पर उठते सवाल थमते नजर नहीं आएंगे।
- वर्जन
एएलएस एंबुलेंस की संख्या बढ़ाने, उपकरणों के मेंटेनेंस और रूट-मैपिंग पर काम जारी है। नई गाड़ियों की मांग शासन से की गई है और शहरी-ग्रामीण रिस्पॉन्स टाइम कम करने की कवायद चल रही है।
- डॉ. केके अग्रवाल, सीएमओ