रुद्रपुर। चलती एंबुलेंस में 50 सुरक्षित प्रसव किसी चमत्कार से कम नहीं। यह एएलएस (एडवांस लाइफ सपोर्ट) और बीएलएस (बेसिक लाइफ सपोर्ट) स्टाफ की ट्रेनिंग, तत्परता और सिस्टम के बेहतर समन्वय का प्रमाण है। इस उपलब्धि के पीछे एक बड़ी सच्चाई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 (अप्रैल से नवंबर) के बीच जिले में एंबुलेंस सेवाओं ने 13,980 आपात मरीजों को उठाया। सवाल यह है कि क्या मौजूदा संसाधन इस बढ़ते दबाव को लंबे समय तक संभाल पाएंगे?
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में 4,663 गर्भावस्था केस, 1,482 सड़क दुर्घटनाएं, 698 श्वसन रोग, 254 हृदय रोग और 578 तीव्र पेट दर्द जैसे गंभीर मामले सामने आए। इसके अलावा अन्य श्रेणी में 6,305 केस दर्ज हुए। यानी औसतन रोज़ाना 50 से अधिक आपात कस। साफ है कि एंबुलेंस अब केवल मरीज ले जाने का साधन नहीं बल्कि चलते-फिरते आपात चिकित्सा केंद्र बन चुकी है।
फिलहाल जिले में तीन एएलएस (काशीपुर, रुद्रपुर और खटीमा) और बीएलएस कुल 22 एंबुलेंस सक्रिय हैं। दो साल पहले जहां केवल 8 एंबुलेंस वहीं अब 25 की मांग सामने आ चुकी है। यह बढ़ोतरी सिस्टम की जरूरत को तो दिखाती है साथ ही यह भी बताती है कि संसाधन विस्तार गति पकड़ने में पीछे रह गया है। खासकर कार्डियक और श्वसन जैसे मामलों में, जहां हर मिनट की देरी जानलेवा हो सकती है, वहां एएलएस की संख्या अपर्याप्त नजर आती है।
खुशियों की सवारी योजना के तहत भी दबाव कम नहीं है। अप्रैल से नवंबर तक 8,140 ड्रॉप-बैक और 679 पिक-अप सेवाएं दी गईं, जिनमें डिलीवरी, यूएसजी और बीमार नवजात शामिल हैं। काशीपुर, रुद्रपुर और सितारगंज जैसे ब्लॉकों में लोड सबसे अधिक रहा। सेवा सराहनीय है लेकिन वाहन और स्टाफ अनुपात पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
नजीजा साफ है 50 सड़क पर जन्म सिस्टम की सफलता हैं, पर लगातार बढ़ते आपात मामले चेतावनी भी हैं। यदि समय रहते नई एएलएस एंबुलेंस, अतिरिक्त स्टाफ और नियमित रिफ्रेशर ट्रेनिंग नहीं बढ़ाई गई तो यह उपलब्धि कल के जोखिम में बदल सकती है।
वर्जन
बीते दो सालों में एंबुलेंस सेवाओं में बढ़ोतरी हुई है। लगातार इस सेवा के विस्तार के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। सीमित संसाधनों में सभी आपात सेवाओं को चलाया जा रहा है ताकि आज जनमानस को स्वास्थ्य दिक्कतों का सामना न करना पड़े। - डाॅ. केके अग्रवाल, सीएमओ