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ज्योलीकोट, ग्वालदम, मटेला, लोहाघाट में खुलेंगी नई इकाईयां

Mon, 05 Oct 2015 12:31 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो/ पंतनगर (ऊधमसिंह नगर)।
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गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर ने अब पर्वतीय क्षेत्र के किसानों की माली हालत सुधारने का निर्णय लिया है।
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पंतनगर में आयोजित किसान मेले के समापन समारोह में पंत विवि के कुलपति ने ऐसे संकेत दिए हैं। पर्वतीय क्षेत्र में स्थानीय जलवायु के अनुसार ऐसी कृषि विकसित की जाएगी, जो स्थानीय कृषकों को आर्थिक रूप से मजबूत कर सके।

गांधी हाल में पंत विवि के कुलपति डा. मंगला राय ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र के किसानों की दक्षता बढ़ाने के लिए कृषि विवि दिसंबर तक ज्योलीकोट, ग्वालदम, मटेला, लोहाघाट में नई इकाईयां खोलने जा रहा है।
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कुमाऊं की पहाड़ियों में फल, सब्जी प्रसंस्करण, प्रसाधन के साथ ही बेरोजगारों को रोजगार से जोड़ने और कृषि को वाणिज्य के साथ जोड़ते हुए किसानों की आर्थिक हालत को सुदृढ़ करने के लिए स्थानीय जलवायु के अनुसार शोध किए जाएंगे और इन इलाकों में बेहतर संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।

 वैज्ञानिक सीधे तौर पर किसानों से जुड़े रहेंगे और कृषि कार्यों में उन्हें हर स्तर पर सहयोग करेंगे। अब पर्वतीय इलाकों में कृषि कार्य के सरलीकरण के लिए जुताई, निराई, गुड़ाई आदि के लिए छोटी और हाथ मशीनें आ चुकी हैं। उनसे किसानों को कम श्रम पर अधिक लाभ मिल सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब 1960 वाली कृषि नहीं चलेगी। कृषि क्षेत्र भी नवीनीकरण चाहता है। पहले एक किलो नाइट्रोजन पोटाश से 50 किलो अनाज पैदा होता था आज एक किलो नाइट्रोजन पोटास से 8 किलो अनाज पैदा हो रहा है।
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भारत में कृषि क्षेत्र के लिए मात्र 20 फीसदी पानी उपलब्ध है जो पश्चिमी देशों की 80 फीसदी के सापेक्ष कहीं नहीं ठहरता है।

 उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र के चहुंमुखी विकास के लिए पंत विवि पूरी तरह सजग है और पूरी निष्ठा के साथ वैज्ञानिक इस दिशा में काम करेंगे।

पंत विवि के कुलपति मंगला राय ने कहा कि चार दिनी किसान मेले में 10068 किसानों ने पंत विवि में रात में निवास किया।

उन्हें संभवतया विवि प्रशासन सुविधाएं नहीं दे पाया लेकिन विवि प्रशासन उन्हें भविष्य में बेहतर सुविधाएं देने के लिए प्रतिबद्ध है।

इन चार दिनों में विवि के स्टालों से 60 लाख रुपये से अधिक के बीजों की बिक्री हुई। पर्याप्त मात्रा में बीज उपलब्ध नहीं करा पाए लेकिन हमारा प्रयास सभी किसानों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में प्रजनक बीज देकर उस बीज को पूरे क्षेत्र में आधारी बीज बनाने के बाद प्रचुर मात्रा में खेती होने पर प्रमाणीकृत बीज बनाना है।
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