पर्वतीय समाज में खुशी एवं हरियाली के प्रतीक हरेला त्योहार हर्षोल्लास से मनाया गया। पांच व सात पवित्र अनाजों से 10 दिन में तैयार होने वाला हरेली घर के कुलदेव, ग्राम देवता के बाद आर्शीवचन के साथ सिर में रखा जाता है।
हरेला पूजने वाला व्यक्ति स्वत: ही लाख हराव, लाख बग्वाल, लाख सिर पंचमी, इन दिन इन बार बेर भेटिए। तेरी एक इक्यासी पांचक पचास है जाओ, दूब जस पलिये गुब जस फुलिए शब्दों के साथ हरेला सिर पर रखते हैं।
सात व पांच पवित्र अनाजों से उगाए जाने वाले हरेले में मक्का, गेहूं, जौ, तिल, सरसों, चना, मटर, उड़द, गहत आदि के बीज घर के परित्र स्थान पूजा स्थल पर टोकरी व डलिया में उगाए जाते हैं। हरेला उगाने का विधान पहले मिट्टी सूखा कर टोकरी, डलिया या पत्तों की टोकरी बनाकर उसमें उगाया जाता है।
टोकरी में पहले मिट्टी फिर मिश्रित अनाज सात बार डाला जाता है। इसमें रोजाना सुबह नहा धोकर शुद्ध जल से सींचा जाता है। नवें दिन की रात्रि में इसकी निराई कर फल रखे जाते हैं। दसवें दिन सुबह पूजा अर्चना के साथ हरेला काटा जाता है। सबसे पहले घर के कुलदेवता ग्राम देवता को अर्पित किया जाता है। उसके बाद घर प्रत्येक सदस्यों को आशीष वचनों के साथ पूजा जाता है।