प्रदेश सरकार की नजूल नीति 2009 के तहत नजूल जमीन को तयशुदा शुल्क जमा कर फ्रीहोल्ड कराने वाले लोग भी अवैध कब्जेदार माने जाएंगे। हाईकोर्ट के ताजा आदेश ने नजूल भूमि को फ्री होल्ड करने के आदेश को असंवैधानिक करार दिया है। ऐसे में नजूल भूमि को फ्रीहोल्ड कराने वाले करीब आठ हजार से अधिक परिवार फिर से अतिक्रमणकारी की श्रेणी में आ जाएंगे। इनमें से कईं लोगों ने मालिकाना हक मिलने के बाद जमीन पर व्यवसायिक गतिविधियां, होटल, मॉल के साथ ही बैंकों और दफ्तरों को किराए पर दे रखे हैं। इसके अलावा कारोबार के लिए करोड़ों का ऋण भी लिया हुआ है।
दरअसल रुद्रपुर नगर निगम क्षेत्र में करीब 1989 एकड़ नजूल भूमि है। नजूल भूमि में बसी 17 कॉलोनियों में करीब 17 हजार तीन सौ परिवार रहते हैं। करीब साढ़े आठ हजार से अधिक परिवारों ने नजूल नीति 2009 के तहत तयशुदा शुल्क जमा कराकर मालिकाना हक हासिल किया है। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों ने नजूल भूमि को फ्रीहोल्ड कराने के लिए जिला प्रशासन के पास तय शुल्क के साथ आवेदन किया है। लेकिन नियमानुसार नजूल भूमि को फ्रीहोल्ड कराकर मालिकाना हल देने के सरकार के फैसले को कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नजूल भूमि सार्वजनिक संपत्ति है। इस संपत्ति को अतिक्रमणकारी के पक्ष में सरकार फ्रीहोल्ड नहीं कर सकती है। साफ है कि फ्रीहोल्ड कराने वाले परिवारों का भी मालिकाना हक जमीन पर नहीं रहेगा और वे भी अवैध कब्जेदार की श्रेणी में आ जाएंगे। इससे उनके समक्ष बड़ी दिक्कतें खड़ी हो जाएंगी। चूंकि कई लोगों ने जमीनों का मालिकाना हक मिलने के बाद उन पर करोड़ों का ऋण लिया है। कुछ ने मॉल, दुकानें, होटल खड़े किए हैं। अब जक जमीन नजूल में दर्ज हो जाएगी तो ऐसे लोगों के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।
निवर्तमान मेयर सोनी कोली ने कहा कि हाइकोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं। लेकिन जमीन पर दशकों से रह रहे लोग उजड़ने की कगार पर आ गए हैं। सरकार से मांग करेंगे कि जल्द से जल्द अध्यादेश लाकर लोगों को राहत दी जाए।
इधर याचिकाकर्ता रामबाबू का कहना है कि सरकार के समक्ष नजूल भूमि में बसे लोगों को रेगुलाइज करने की चुनौती है।