काशीपुर। साढ़े तीन साल बाद भी बंद हो चुकी काशीपुर शुगर मिल की नीलामी न होने से किसानों को 25 करोड़ रुपए नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में नोट बंदी के बीच गन्ना किसानों की परेशानी में और इजाफा हो गया है। किसान नेताओं का तो साफ आरोप है कि सरकार की उदासीनता के चलते ही किसानों को इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इनके रुख से साफ है कि विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा प्रदेश सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।
काशीपुर चीनी मिल राज्य गठन के बाद से ही गन्ना किसानों के लिए परेशानी का सबब रही है। मिल पर किसानों का वर्ष 2007-08 का एक करोड़ 17 लाख और वर्ष 2011-12 का 23 करोड़ 74 लाख 94 हजार रुपये बकाया है। इसके अलावा सहकारी गन्ना समिति के कमीशन का एक करोड़ रुपया भी देना बाकी है।
परिसमापक (लिक्वीडेटर) नियुक्त होने के साढ़े तीन साल बाद भी किसानों को बकाया भुगतान नहीं मिल पाया है। नोट बंदी में सहकारी बैंकों से कैश न मिलने से परेशान किसान अब इस बकाया भुगतान की मांग को नए सिरे से उठा रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन सहित किसानों के कई संगठन बकाया भुगतान की मांग तो लगातार कर रहे हैं।
इनका कहना है कि मामला कई बार पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्री तक पहुंचा, लेकिन हर बार परिसमापक के पास मामला होने की बात कहकर टाल दिया गया। किसान नेताओं के मुताबिक किसानों ने काशीपुर सहकारी गन्ना समिति को गन्ना दिया था, जो सरकार की समिति है। सरकार को ही किसानों को बकाया भुगतान करना चाहिए।
किसान पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से भी मिले थे। जब मिल का मामला बीएफआर बोर्ड में चल रहा था, तब भी किसानों को पक्षकार बना कर नहीं सुना गया। काशीपुर शुगर के पूर्व जीएम राजीव अग्रवाल ने कहा कि राज्य गठन के समय काशीपुर चीनी मिल का 50 प्रतिशत गन्ना क्षेत्र यूपी में चला गया गया। जो गन्ना क्षेत्र बचा था, उस पर भी सरकार ने आईजीएल को शीरा बनाने की मिल का लाइसेंस दे दिया। इससे मिल को क्षमता के अनुसार गन्ना नहीं मिला। मिल बंद होने से पहले चीनी का उत्पादन 1800 से लेकर 2000 बोरी प्रतिदिन था।