सितारगंज। ग्रीष्मकालीन धान के बजाय दूसरी फसलों को प्रोत्साहित करने के लिए बुधवार को सिसौना गांव में अधिकारियों ने किसानों के साथ बैठक की। विशेषज्ञों ने किसानों को ग्रीष्मकालीन धान की सिंचाई के लिए पानी की अतिरिक्त जरूरत और जलस्तर गिरने के बारे में बताया।
विशेषज्ञों ने कहा कि ग्रीष्म ऋतु में किसान अधिक मुनाफा कमाने के लिए बेमौसमी धान की खेती करते हैं। बताया कि बेमौसमी धान से लाभ कम और नुकसान अधिक होता है। ग्रीष्म ऋतु में मक्के की फसल धान के मुकाबले बेहतर विकल्प है। इससे भूजल स्तर संतुलित करने और मिथेन का उत्सर्जन रोकने में मदद मिलती है। मक्के में कम लागत में किसान अच्छा मुनाफा कमा सकता है। साथ ही इससे खेत की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी।
कहा कि वसंतकालीन मौसम में कई वर्षों तक लगातार धान की खेती करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी आ जाती है। फसल चक्र में असंतुलन से उत्पादकता प्रभावित होती है। इससे मिथेन गैस का अधिक उत्सर्जन होता है। इससे ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचता है। लगातार बे-मौसमी धान की उपज से भूजल गिरता है और धान की अगली फसल पर भिन्न प्रकार की बीमारियां और कीड़े लग जाते हैं। इससे किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। वक्ताओं ने मक्का, गन्ना, मोटा अनाज बोने के बारे में किसानों को प्रोत्साहित किया। वहां एसडीएम रवींद्र जुवांठा, कृषि अधिकारी डॉ विधि शुक्ला, सुरेश राणा, डॉ अजय प्रभाकर, ऋषिपाल सिंह, केसी पंत, सुमित गोढ़, राजीव कुमार, मो.अशरफ, गुंजिता भट्ट, भगीरथ आदि थे।