काशीपुर। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण देहरादून की ओर से गोविषाण टीला में करीब 22 साल बाद एक बार फिर उत्खनन शुरू हो गया है। कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत ने भूमि पूजन कर उत्खनन कार्य का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कराया जाएगा।
बाजपुर रोड स्थित ऐतिहासिक गोविषाण टीला में कई सभ्यताओं के अवशेष दफन हैं। यह अपने अंदर कई कालखंडों की सभ्यता, संस्कृति और मानव जाति के विकास को समेटे हुए हैं। समय-समय पर हुई खोदाई में यहां महाभारत काल से लेकर बौद्ध काल तक के अवशेष और सभ्यताएं मिल चुकी हैं। अब एक बार फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण देहरादून की ओर से गोविषाण टीले में करीब 22 साल बाद उत्खनन शुरू कराया जा रहा है।
बृहस्पतिवार को कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत ने गोविषाण टीला पहुंचकर खोदाई कार्य का अनुष्ठान और गेती से जमीन खोदकर शुभारंभ किया। पुरातत्व विभाग के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. मोहन चंद्र जोशी ने कमिश्नर को वर्ष 1965 से लेकर 2003-04 तक हुई खोदाई की जानकारी दी। उत्खनन के दौरान निकले अवशेष को दिखाते हुए टीला परिसर में प्रस्तावित सौंदर्यीकरण व पर्यटकों के लिहाज से विकसित करने की कार्ययोजना का ड्राफ्ट मैप भी दिखाया। विभाग का उद्देश्य गोविषाण टीला को देश-विदेश में प्रसिद्धि दिलाने का है।
राज्य की धरोहर है टीला
कुमाऊं कमिश्नर ने कहा कि गोविषाण टीला देश के साथ राज्य की धरोहर है। इसके मूल स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए इसे राष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कराया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि टीला क्षेत्र में घूमने आने वाले पर्यटकों व शोधकर्ताओं के लिए मूलभूत सुविधाएं विकसित की जाए। साथ ही परिसर में लाइटिंग, पेयजल की व्यवस्था की जाए और सुरक्षा की दृष्टि से कोई लापरवाही नहीं बरती जाए। टीला परिसर में आ रहे तेंदुओं को पिंजरे में कैद करने के निर्देश दिए। इससे पहले कमिश्नर ने परिसर में हरेला पर्व के अवसर पर रुद्राक्ष का पौधा रोपा। वहां पुरातत्व विभाग के संरक्षक सहायक दिनेश शर्मा, सहायक अधीक्षण पुरातत्वविद कविता बिष्ट, उप मंडल प्रभारी दिनेश शर्मा, एसडीएम अभय प्रताप सिंह, तहसीलदार पंकज चंदोला, एसपी स्वप्न किशोर सिंह, वन क्षेत्राधिकारी देवेंद्र रजवार, कमलेश पांगती, डॉ. पाल सिंह राणा, रंजीत सिंह बिष्ट आदि थे।
कब-कब हुआ उत्खनन
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से वर्ष 1965-66, 1970-71, 2002-03 में यहां टीले के शीर्ष स्थान पर एक सीमित भू-भाग में पुरातात्विक उत्खनन किया गया था। उत्खनन में एक ऊंचे चबूतरे पर गुप्तकालीन ईंटों से निर्मित मंदिर के अवशेष और गर्भगृह मिला था। इसके अलावा मंदिर प्रांगण के चारों ओर दो घेरे वाली दीवारें संभवत: 6वीं व 7वीं शताब्दी ईस्वीं की मिली। यहां उत्खनन में मिट्टी का साढ़े पांच फीट ऊंची मिट्टी के दो घड़े मिले जिनमें अनाज भरा हुआ था। भगवान त्रि-विक्रम की मूर्ति मिली जो भारत सरकार के दिल्ली संग्रहालय में हैं। वहीं भगवान नरसिम्हा की विशाल मूर्ति मिली जो वर्तमान में अल्मोड़ा के संग्रहालय में रखी हुई है।