नई दवा खरीद नीति में दवाओं और सर्जिकल सामान के लिए टेंडर नहीं होने के दिक्कतें बढ़ना शुुरू हो गई हैं। सर्जिकल उपकरणों के अलावा विभिन्न जांचों में प्रयोग होने वाले रसायन भी किसी तरह कामचलाऊ व्यवस्था के तहत उपलब्ध कराए जा रहे हैं। धीरे-धीरे यह स्थिति भयावह होने की ओर अग्रसर है। टेंडर की शर्तें इतनी कठिन हैं कि दो बार टेंडर आमंत्रित करने के बाद भी कोई कंपनी दवाइयों के लिए टेंडर डालने को तैयार नहीं हैं। प्रमुख अधीक्षक भी दिक्कतें होने की बात स्वीकार रहे हैं।
नई दवा खरीद नीति के तहत अब 103 दवाओं के अलावा बाकी दवा टेंडर से खरीदी जानी हैं। इसके अलावा सर्जिकल सामान रुई, सुई, सीरिंज, गौस पास, बैंडेज, नलकी, ग्लूकोज के अलावा विभिन्न प्रकार की जांचों में प्रयोग होने वाले रसायन भी टेंडर से खरीदे जाने हैं। लेकिन टेंडर की शर्तें बेहद कठिन होने के कारण अभी तक यह प्रक्रिया अधूरी पड़ी है। जिसका असर अस्पतालों में दिखने लगा है। जिले के सबसे बड़े अस्पताल में भी परेशानियों ने मुंह उठाना शुरू कर दिया है। 103 दवाओं की सूची में लार्ज आयरन की गोलियां, डिस्टिल वाटर, मलेरिया की दवा, डिलीवरी के लिए प्रयोग होने वाली दवाएं, एंटासिड सहित अनेक दवाएं नहीं है। जिसकी पहले से ही अस्पताल में कमी है।
वहीं सर्जिकल आयटम की कमी होना भी शुरू हो रही है। प्रमुख अधीक्षक डॉ. आरके पांडे बताते हैं कि फिलहाल दवाएं और अन्य चीजें बाजार से नहीं मंगानी पड़ रही हैं, लेकिन समस्याएं खड़ी होना शुरू हो गई हैं। इंजेक्शन, ग्लूकोज और अन्य सर्जिकल सामानों की कमी हो रही है। पुराने टेंडरधारकों और किसी तरह परमिशन लेकर कमी को दूर किया जा रहा है, लेकिन यह बहुत दिनों तक नहीं चल सकता है। अगर टेंडर नहीं हुए तो स्थितियां विकराल होना तय है। डाक्टरों को अस्पताल में उपलब्ध दवाएं लिखने के निर्देश हैं।