पंतनगर। ला-नीना प्रभाव के आंशिक असर के चलते प्रशांत महासागर में एक भी विक्षोभ सक्रिय नहीं हो सका है। इसके चलते पूरा दिसंबर बीतने को है लेकिन बारिश का नामो निशान नहीं है। इससे सूखी ठंड पड़ रही है जिसके चलते गेहूं की फसल में यलो रस्ट (पीला रतुआ) की संभावना बढ़ चली है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार अगले पांच दिनों तक बारिश की कोई संभावना नहीं है।
जीबी पंत कृषि व प्रौद्योगिक विवि स्थित कृषि महाविद्यालय में प्लांट पैथोलाॅजी में वैज्ञानिक डाॅ. बिजेंद्र कुमार ने बताया कि दिसंबर-जनवरी में अमूमन चार-पांच पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होते थे। इससे बारिश होती थी और यलो रस्ट ज्यादा प्रभावी नहीं हो पाता था लेकिन इस बार विक्षोभ सक्रिय नहीं होने से अभी तक बिल्कुल बारिश नहीं हुई।
इससे गेहूं की फसल में पहले यलो फिर ब्राउन रस्ट के प्रकोप की संभावना बढ़ गई है। गेहूं की फसल अब उस स्थिति में पहुंच गई है जहां पर रस्ट लगने की प्रक्रिया शुरू होती है।
इसके स्पाॅज पहाड़ों, विशेषकर हिमालय की ओर से उड़कर आते हैं जबकि ब्राउन रस्ट दक्षिण-पूर्व से आते हैं, जो बारबरी या किल्मोड़ा में पनपते हैं। साथ ही फसल के साथ उगने वाली खरपतवार भी इसके लिए उत्तरदायी हैं।
इसके अलावा सरसों और अन्य फसलों में भी विभिन्न बीमारियां पनपने की संभावना है। जैसे सरसों के पत्तों पर अल्टरनेरिया फफूंद के धब्बे और व्हाइट रस्ट आने की संभावना है। डाॅ. बिजेंद्र ने बताया कि गेहूं में यलो रस्ट के लिए प्राॅपिकोना (टिल्ट), व्हाइट रस्ट के लिए मैटालेजिल का स्प्रे उपयोगी साबित होता है।
-इन्सेट में
आलू में पछेती झुलसा रोग का खतरा
पिछले वर्षों में आलू के उत्पादन में कमी आई है। इसका मुख्य कारण पछेती झुलसा रोग है। आलू शोध परियोजना, मौसम विभाग और पंतनगर विवि ने पंतनगर और निकटवर्ती क्षेत्रों में आलू में पछेती झुलसा रोग की संभावना व्यक्त की है। पादप रोग विज्ञान की प्राध्यापक डाॅ. बिजेंद्र ने आलू उत्पादकों को सलाह दी है कि जिन्होंने फफूंदनाशक का छिड़काव नहीं किया है, वह पछेती झुलसा से बचाव के लिए मैंकोजेब का घोल बनाकर जल्द छिड़काव करें। वहीं मौसम ठंडा और आसमान में बादल बने रहते हैं तो यह स्थिति रोग प्रसार के बेहद अनुकूल है। ऐसी स्थिति में सात से 10 दिन बाद मैंकोजेब का पुन: छिड़काव करें।