गढ़ीनेगी में सत्संग को संबोधित करते महाराज हरिचैतन्यपुरी।
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श्री हरिकृपा पीठाधीश्वर हरि चैतन्यपुरी ने कहा कि संकीर्णताओं के दायरे से उठकर राष्ट्रहित में कार्य करें। उन्होंने कहा कि व्यक्ति में परमात्मा के प्रति विश्वास ही नहीं अपितु दृढ़विश्वास होना चाहिए। ईश्वर के प्रति यदि मन में संशय का भाव आता है तो भक्त की भक्ति स्वत: ही नष्ट हो जाती है। निज हित में चिंतन करने की स्थिति में ऐसा होता है।
चैतन्यपुरी सोमवार को गढ़ीनेगी स्थित श्री हरिकृपाधाम में भक्तों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मानवता, नैतिकता, चरित्र का निरंतर ह्रास हो रहा है। हम स्वयं इतनी चिंता नहीं कर सकते जितनी प्रभु परमात्मा के प्रति चिंतन पर हमारी चिंता करेंगे। संसार में सभी लोग स्वार्थवश ही संबंध रखते है। बिना स्वार्थ के संबंध बनाए रखने वाले व्यक्ति अपवाद स्वरूप ही मिलेंगे। बिना किसी स्वार्थ के जीवों का हित चाहने वाले संत, गुरु व परमात्मा ही हैं।
उन्होंने कहा कि बिना विचारे कोई कर्म न करें और न कुछ बोलें। विचारशील प्राणी कुछ भी बोलने और व्यवहार करने से पहले विचार करता है ताकि उसे आत्मगिलानी, पश्चाताप व उपहास का सामना नहीं करना पडे। संत, गुरु व परमात्मा दाता है न कि भिखारी। संत, गुरु, ब्राह्मण व शिक्षकों ने अपने सम्मान व गरिमा को स्वयं खोया है। संत व गुरु हमारी संपत्ति नहीं, अपितु संतति चाहते हैं।