रुद्रपुर। जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (डीएमएचपी) ने वर्ष 2025–26 में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का फोकस बच्चों और किशोरों पर केंद्रित कर एक सकारात्मक और दूरगामी बदलाव की नींव रखी है। आधिकारिक मॉनिटरिंग रिपोर्ट के अनुसार, जिले में पहली बार मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं अस्पताल की चहारदीवारी से निकलकर कक्षा, कॉलेज और समुदाय तक पहुंचीं।
डीएमएचपी के तहत स्कूल स्तर पर नियमित काउंसलिंग सत्र आयोजित किए गए जिनमें परीक्षा तनाव, व्यवहार संबंधी समस्याएं, आत्मविश्वास की कमी और पारिवारिक दबाव जैसे मुद्दों पर बच्चों से खुलकर संवाद किया गया। हर माह 70 से 160 बच्चों को प्रत्यक्ष काउंसलिंग दी गई। इसमें बच्चों में यह विश्वास पैदा हुआ कि मानसिक परेशानी भी इलाज योग्य है।
शिक्षकों को बनाया गया ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’
कार्यक्रम के तहत स्कूल और कॉलेज शिक्षकों को लाइफ स्किल्स और मानसिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण दिया गया। इससे शिक्षक बच्चों के व्यवहार में बदलाव पहचानकर समय रहते काउंसलिंग और रेफरल की भूमिका निभाने लगे। पीएचसी और सीएचसी स्तर पर लगाए गए आउटरीच कैंपों से ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों और किशोरों को भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं मिलीं। यह उन परिवारों के लिए राहत साबित हुआ, जो अब तक मानसिक समस्याओं को नजरअंदाज करते थे। मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन के माध्यम से संकट में फंसे बच्चों और किशोरों को तत्काल संवाद और मार्गदर्शन मिला। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पहल आत्महत्या रोकथाम की दिशा में बेहद अहम है।
-
काउंसलिंग से बच गया बचपन
कभी चुप्पी में सिमटा, डर के साए में जीता एक बचपन फिर मुस्कुराने लगा है। एक अभिभावक बताते हैं कि उनका बच्चा रात में डरकर उठता था और स्कूल जाने से कतराने लगा था लेकिन काउंसलिंग के कुछ सत्रों के बाद उसका आत्मविश्वास लौट आया। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर संवाद और परामर्श कई बार बड़े खतरे को टाल देता है। काउंसलिंग ने न सिर्फ बच्चों को संबल दिया बल्कि उनका बचपन भी बचा लिया।
वर्जन:::::::::::
डीएमएचपी का उद्देश्य केवल अस्पताल तक सीमित इलाज नहीं बल्कि बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को समय रहते पहचानना और संभालना है। स्कूलों, गांवों और समुदाय स्तर पर काउंसलिंग से बच्चों में भरोसा बढ़ा है। जब बच्चे खुलकर बोलते हैं, तभी सही इलाज संभव हो पाता है। यह पहल आत्महत्या रोकथाम और मानसिक रूप से स्वस्थ पीढ़ी के निर्माण की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण है। -
डॉ. ईके ढल्ला, मनोरोग चिकित्सक