रुद्रपुर। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नीरज कुमार की अदालत ने 12 साल पुराने फर्जी एमबीबीएस डिग्री मामले में कथित डॉक्टर को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। वर्ष 2014 में लखनऊ निवासी यशवंत कुमार ने उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण के लिए आवेदन किया था। आवेदन के साथ उसने उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल का एमबीबीएस स्थायी पंजीकरण प्रमाणपत्र पेश किया था। जांच के दौरान उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल ने उक्त प्रमाणपत्र को फर्जी और जाली बताया जिसके बाद उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल ने उसका आवेदन निरस्त कर दिया था। आरोप था कि इसी कथित फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर वह रुद्रपुर की डॉक्टर्स कॉलोनी स्थित कैलाश अस्पताल एवं ट्रॉमा रिहैब का संचालन कर आर्थिक लाभ अर्जित कर रहा था। तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ. वाई सिंह बिष्ट की तहरीर पर पुलिस ने अभियुक्त के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और कूटरचित दस्तावेज के इस्तेमाल समेत विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की थी।
पुलिस ने चार्जशीट अदालत में दाखिल की और मामले की सुनवाई अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष अपने प्रमुख गवाहों के बयान विधिक रूप से साबित नहीं कर सका। मुख्य गवाह डॉ. वाई. सिंह बिष्ट और विवेचना से जुड़े सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक उमेश राम आर्या सिर्फ मुख्य परीक्षा के लिए उपस्थित हुए जबकि बचाव पक्ष को जिरह का अवसर नहीं मिल पाया। कई समन और अवसर दिए जाने के बावजूद दोनों गवाह अदालत में उपस्थित नहीं हुए। पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर अदालत ने अभियुक्त यशवंत कुमार को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।