काशीपुर। चैती मेला का नखासा बाजार उत्तरी भारत में लगने वाले बडे़ नखासा बाजारों में से एक है। चंबल के डकैत चैती के नखासा बाजार से ही पसंदीदा घोड़े खरीदकर ले जाते थे। सुल्ताना डाकू तो खुल्लम-खुल्ला नखासा बाजार में आता था।
चैती मेला में देवी का डोला चैती मंदिर में आने तक नखासा बाजार लगता है। घोड़ों के खानदानी व्यापारियों के अनुसार आजादी से पहले यहां काबुल, पेशावर, गुजरात तक के महंगे घोड़े आते थे। उत्तरी भारत में मुक्सर, जगराम, नाबा मोड मंडी (पंजाब), यूपी में देवाशरीफ (बाराबंकी) मकनपुर (कानपुर), सोरो (एटा), रायदपुर, रमजानपुर, कुदंकी, मईबसई (बदायूं), चौबारी और नवाबगंज (बरेली) में नखासा बाजार लगते हैं। परंतु चैती के नखासा बाजार में अच्छी नस्ल के घोड़े आते हैं। घोड़ों के व्यापारियों ने बताया कि उनके बुजुर्गों के मुताबिक डाकू मान सिंह गिरोह के लोग भी घोडे़ खरीदने के लिए सालभर तक चैती मेला का इंतजार करते थे। चंबल के डाकुओं को काबुल के घोडे़ खासे पसंद थे। जो चैती के नखासा बाजार में ही मिलते थे। बिजनौर का कुख्यात डाकू सुल्ताना तो स्वयं चैती मेला में आता और पसंद के घोड़े खरीद कर ले जाता था।
वहीं अब आधुनिकीकरण के साथ ही घोड़ों का चलन घटने लगा। 10 साल पहले तक यहां गुजरात के मालवा तक के घोड़े आते थे, लेकिन अब यह बाजार सिमट गया और घोड़ों की संख्या भी घटने लगी। पहले यातायात का मुख्य साधन ही घोड़े ही होते थे। शौकीन तो अब भी हैं परंतु इनकी संख्या काफी कम। एक दशक पहले कांग्रेसी नेता अकबर अहमद डम्पी भी चैती मेला से एक घोड़ा खरीद कर ले गए थे।